निवेदिता ::






आना तुम कभी

गीली आंखों में यादों के कुछ बादल उमड़े हैं
भीगा-भीगा मन याद करता है
शफ्फाक दिन
बसंत की ढेर सारी हरी पत्तियां

दिल का परींदा उड़ जाता है
हंसती आंखों में ख्वाब लिए
सड़कों पर फिरते वे दिन याद है

रातों में मीठी नदियों सा बहना
एक देह का नदी में उतरना
और गुलमोहर सा खिल जाना याद है
धूप का शाखों पर गिरना
किसी किताब से निकलकर शब्दों का
बह जाना

एक भीगी सुबह और अंतहीन विस्मृति
बेचैन चुम्बनों के साथ
तुम्हें विदा करना याद है.


तुम आओ भी

घने कोहरे से लिपटी शाम की नीली आभा में
ओस की नन्हीं बूदें चमकती हैं

शाखों पर    
पत्तियां जो हरी थी
बूंदों से भर गयी है

झर रहे हैं कनेर के फूल
तुम्हारी हंसी की तरह
भर लेना चाहती हूँ सांसों में
गर्म, पिघलती हंसी

फैल रही है रात कतरा-कतरा
मेरी बंजर भूमि में
खिल आए हैं गुलाब के फूल

तुम्हारी देह मेरी आत्मा में गुथीं हुई
उत्तेजित चक्रवात की तरह
घुमड़ती रहती है

मैं चाहती हूं सुनो तुम
वे गीत जो गाए नहीं गए
वे गीत जो रचे नहीं गए
वो प्रेम जो पुरानी राहों में
बिछा रह गया

वो एकान्त जो धधकता रहा
प्यार करो मुझे
मुझमें डूब जाओ
की मेरी आत्मा पर हो बारिश
शीत और आग के बीच
मैं खिलाऊ जीवन के फूल

मेरे हमसफर  

जख्म जितने थे
सब हरे हुए
दर्द इतना है
पर कोई चारागर नहीं
दिल के कत्लगाह में
कत्ल होने को तैयार बैठे रहे हम
दर्द-ए पिन्हां थे
पर कह न सके
तेग-ए इश्क  से घायल हम दोनों
कौन किसका जख्म भरे ए दिल
जिस्म दहकता लावा बन
सुलगता रहा
आंसुओं से लिपटी रात
भींगती रही
रंग-बेरंग हुई
ख्वाब-बेख्वाब हुए
दिल –ए- गमदीद की
कौन फिक्र करे
ए दिल अब कोई हमसफीर नहीं

तुम्हारा शहर

अक्सर सोचती हूँ कैसा होगा वो शहर
जहां तुम बसते हो
कैसी होगी वो सुबह
जो तुम्हें छूते हुए उठती है
तुम्हारी अलसायी सी
सांसों की कम्पित ध्वनियां
मुझ तक पहुंचती है

गर्म सांसों में ताजा चाय की खुशबू 
नई पत्तियों की हरी-हरी गंध
तुम्हारे होठों से लगकर सूर्ख हो गई है
और कोसों दूर मेरा चेहरा लाल हो गया है
जैसे लाल पलाश के फूल

देखती हूँ बिन बुलाए बसंत आ गया है
बसंत की धुली-धुली सी हवा
चारो दिशाओं में फैल गयी है
धूप से भरा बादल का टुकड़ा
तुम्हारे चिलमनों से झांक रहा है
क्या कर रहे होगे तुम अभी
शायद कविता की कोई किताब
तुम्हारे हाथों में होगी
देखो प्रिय
कविताएं झर रही है
सफेद झक-झक फूलों की तरह
शब्द बह रहे हैं
आओ साथ-साथ भीगे
मैं नदी बन बहती रहूं तुम्हारे भीतर

प्रेम 

::

तुम हो मेरी सघन इच्छाओं की तरह
इच्छाएं बांध लेती हैं मुझे
प्यार के सांचे में ढ़ाल देती हैं.

::

हमारे बीच सिर्फ शब्द यात्रा करते हैं
दूर पहाडि़यों से उतरते है शब्द
नदी,झरनों में तैरते हुए
भीगे - भीगे से पहुँचते है

::
आसमान स्याह है
चाँद डूबता सा
ख्वाबीद-ख्वाहिशे जगने लगी
फस्ल-ए-गुल आया भी तो क्या
वस्ल के दिन की आरजू ही रहीं.


5 टिप्‍पणियां:

  1. निवेदिता की कविताएँ सूफियाना मिजाज़ की कविताएँ हैं... इश्क की वही तेज़ गंध...और अपने कि मिटा देने का वही तेवर ... अपर्णा आपको बधाई इन कविताओं के लिए ...

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  2. प्रेम की फुहार से अंदर तक भिगोती हुई सुंदर कविताये ...बधाई निवेदिता जी और अपर्णा जी आपको

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  3. नि‍वेदि‍ता, आपकी कवि‍ताएं पढ़कर मन भींग गया.....आप बहुत अच्‍छा लि‍ख रही हैं। आप रंगमंच की एक सशक्‍त अभि‍नेत्री तो हैं ही....

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  4. Tara Chandra Tripathi14 मई 2011 को 9:37 am

    जिन्दगी इस से परे भी है
    निर्मलतारा

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