बाबुषा ::

कुछ ऐसा हुआ कि एक लड़की की बावन चिठ्ठियाँ मेरे हाथ लग गईं। उन्हें किसी दराज़ में रखना मुमकिन नहीं था। लिफ़ाफ़े उनके लिए बने नहीं थे। उनकी मज़बूती का राज़ ये था कि वे जिस भाषा को जानती थीं वह जानते सब थे पर बोल नहीं पाते थे। वह भाषा बुद्ध से होती हुई फ़कीर कबीर तक आयी थी। आइसलैंड की धरती पर वह डेनमार्क के सामने खड़ी हुई थी कभी -चुनौती देती हुई। गांधी ने उसे आजमा कर देखा था। नेल्सन ने जिसे रंगों से आज़ाद किया था।
आप लोगों को चिट्ठियों की सुगंध याद है भी या नहीं -बावन नीले इनलैंड में से कुछ आपके पते पर भी हैं। आपको अपना पता तो याद है न। 


बाबुषा के पास संवेदना का वह स्वर है जो प्रेम से शुरू होता है और प्रेम में घुल जाता है। उनकी कविताएं ऊर्जा से भरी कविताएं हैं। जिजीविषा की कविताएं हैं। 

मेरी तरफ से भी एक खत  :: हर उस कवि के लिए जो प्रेम के भीतर रहकर लड़ता है। क्रांति और प्रेम न लाल रंग से अलग हो सकते हैं और न बुद्ध व मार्क्स से 
 
एक लड़की है- नौ ग्रहों के जंगली अश्वों को एड लगाये। प्यार का अश्वमेध है ! उसने जीन तोड़ दी है और अनादि में कोड़ों को उछाल फेंका है। लगाम की आस्थाएं चकनाचूर कर उसने घोड़ों को साध लिया है।
उसकी उँगलियों के दस पोर दस दिशाओं को हड़काते हैं। उसे आसमान के साम्राज्य से चिढ है और धरती की नंगी पीठ से प्यार। अभी-अभी अपनी मुहब्ब्त से उसने तोडा है नफ़रत का सिंहासन। सियासतों को फकीरों के झोले में डाल दिया है। उसके चिमटे ने जो अंगारा पकड़ रखा है वह सिंघाड़े जितना मीठा है। वह तुम्हारी जीभ को दाग सकती है गेंहू के छोटे दाने से और जहाँ तुम अपनी बंदूके छिपा आये हो अभी वहाँ इस कीमियागर ने सब बदल दिया है। तुम्हारे बोरे में धरती भर गई है। बोरे से उगने लगे हैं पेड़ और फूल. आने लगे हैं पंछी अटलांटिक से निर्जन प्रशांत के धधकते टापुओं की ओर। इसने उन बच्चों के साथ मिट्टी में लोट लगा दी है जहाँ आज भी रेडियोएक्टिव कीटाणु बच्चों की देह कुतर रहे हैं। यह उन लोगों के साथ नहा रही है , जहाँ कब्बानी अपनी मुहब्ब्त की याद में खजूरों से प्रश्न पूछता है ? मेरी बालक़िस -अल -रवि कौनसा माँसाहारी पेड़ निगल गया तुम्हें ?
मशरिक में बैठी लड़की अपने हाथों से उजालों के गोले फेंक रही है -ये अफगानिस्तान की ज़मीन पर उदास बैठे मदरसों में मुस्कान फेंक आयेंगे, गिरेंगे इथोपिया की मासूम हथेलियों पर और भूख को अपने धागों में लपेट कर दुनिया से पूछेंगे कि स्याह पेट के लिए इतनी कमी क्यों ? कोपेनहेगन के समंदर में जो उदास बैठी है मरमेड -उसकी गोद में गिरेंगे ये लच्छे उजालों के ,जिन्हें पकड़कर वह मंटो के मुंह से कहनियाँ कहलवाएगी। और तुम मंटो पर प्रतिबंध लगाने की साजिश रचोगे। साजिश स्वतंत्रता का ऐलानी घंटा है -जो चीखकर तुम्हें अपनी सूई के नीचे खड़ा करता है।  पेंडुलम का दोलन तुम्हारे खून में चलता समय है -इसे तुम कैसे रोक सकते हो।
पूरब में बैठी लड़की पश्चिम के पाँव से काँटा निकाल रही है।
दर्द का ज्वार घटने लगा है
और धरती का तापमान अनुकूल अब।



ख़ुदकुशी ( दो कविताएँ )

आतिला योज़ेफ़ के लिए::

[ हंगेरियन कवि  योज़ेफ़ ने 32 वर्ष की उम्र में ट्रेन की पटरियों के नीचे आ कर आत्मघात कर लिया था. ]

...और एक दिन अलसुबह वो बिस्तर से  उठा.

सूरज सही वक़्त पर अटारी पर आ बैठा था. पर रात थी कि कमबख्त ! कटी ही नहीं थी.  नींद ने एक बार फिर ऊँची आवाज़ में उसका नाम पुकारा. वो पुकारों को अनसुना करने के मानी जानता था कि उसकी जेबें चीख बन चुकी अपनी ही कातर  पुकारों से भरी पड़ी थीं.

सिक्के खन् खन् टकराते थे और हुआ यूँ साहब कि बस ! जेब कट गयी.

उस रोज़ अलसुबह कच्ची नींद में उठा था वो कि अब पक्की नींद के लिए  कुछ जुगाड़ किया जाए. और जैसा कि ख़बर कहती है कि सूरज एकदम सही वक़्त पर अटारी पर चढ़ आया था.
पर हाय ! वो रात थी कि कटी ही नहीं थी.

उसने अपनी आत्मा के हज़ार टुकड़ों के मुक़ाबले अपनी देह के सौ टुकड़े कर देना चुना. ता-उम्र अपनी पीठ पर अपने ही टुकड़े बाँध कर फिरता था.  ज़िंदगी ने उसे पीठ के दर्द दिए थे

उसके मन पर चील-गिद्धों के नाखून ताज़िन्दगी  रहे. उस रोज़ धरती को चूम कर वो गहरी नींद सो गया.   लोरी जैसी होती है भाप -इंजन की खड़खड़ उसके लिए, जो एक अरसे से सोया न हो.

आसमान कहता है कि किसी को इतने रतजगे न दो कि वो पक्की नींद का पता ढूंढें.
आसमान के पास आँखें हैं, पर हाथ नहीं.

ज़ख़्मी गर्दन पर तमगे टाँगे गए. उसकी नींद की मिटटी पर गुलाब के फूल उगा दिए गए.

आख़िर शान्ति और सन्नाटे में कोई तो फ़र्क होता है.

दरअसल, मेरे दोस्त !
सन्नाटे न तोड़े गए तो जम्हाई आती है कि बत्तीस साल बहुत से सवालों की उम्र होती है.



ज़िया खान के लिए::


कैसे कोई सत्तर दफ़ा चढ़े - उतरे जो उम्र की सारी बारिशें, नमक के टीलों में बदल जाएं ? कैसे कोई सत्तर गुरियों की माला पिरोए जो उम्र के सारे बसंत पानी की बूँदों में ढल जाए ?

ऊँची शाख से लिपटे रसीले अंगूरों के गुच्छे दरअसल बाग़ के माली की साज़िश है. वो इने- गिने ही रास्ते हैं, जिन पर सांसें सरपट दौडती हैं. मौत हज़ारों-हज़ार तरीक़े से अपनी ओर रिझाती है.

तुम आओ और समन्दर में ज़हर घोल दो. बादलों को एक ख़ाली इंजेक्शन दे दो कि पानियों के बूते कोई बच न जाए. तुम आओ और आग को भस्म कर दो. एक- एक लौ का गला घोंट दो कि रूह की अगन कभी भड़कने न पाए. तुम आओ और आसमान को चाक़ू से गोद दो. तारों को मार कर ज़मीन में गाड़ दो कि दुआ में कभी कोई हाथ न उठने पाए. तुम आओ धरती के चेहरे पर तेज़ाब फेंक दो. उसका पेट गोलियों से दाग दो कि दोबारा कभी वो बच्चा न जन पाए. तुम आओ और हवा के सीने में खंजर घोंप दो. ऑक्सीजन क़ैद कर ताबूत में रख दो कि घिसटती हुयी साँसों को कुछ तो सुकून आए. तुम आओ और बोज़ोन को अपनी मुट्ठी में मसल दो कि दुनिया बचने की कोई गुंजाइश भी न बचे.

वो इने- गिने ही रास्ते हैं, जिन पर सांसें सरपट दौडती हैं. मौत हज़ारों-हज़ार तरीक़े से अपनी ओर बुलाती है.

मैं भी मार्स में लेटे-लेटे सारा अ-मंगल देखूंगी. साइंसदान सुर्ख़ रंग की कुछ तो भी वजह बताते हैं.
एक रोज़ मेरे हाथ में भी एक धारदार ब्लेड था और तुम ने कलाई पर आसमान बाँध दिया था . ढलती शामों की नसों में ओ' पॉज़िटिव चमकता है. मार्स की मिट्टी का रंग भी कुछ और गहराता जाता है.

माना कि मेरी हथेली में मग़रिब नहीं है पर सूरज है कि उँगलियों के बीच की दरारों में डूब जाता है

...तो फिर मैं क्यों कर जियूँ कि जब गाय पॉलीथीन खाती है, मछली ख़ाशाक खाती है, आदमी सूअर खाता है और औरत चबाती है अपना ही गुलाबी कलेजा !

हर कोई ख़ुद को मारने पर उतारू है !


ताज़े 'फूल'::

जल कर कोई भस्म नहीं होता. राख के मलबे में सबसे ताज़े 'फूल' खिलते हैं. सूर्य एक जलता हुआ फूल है, जिसकी धूप धरती के कोने-कोने को सुगंध से भर देती है.

पता नहीं वो किस की मटकी फूटी थी, पता नहीं वो किसकी अस्थियाँ बिखरी थीं, पता नहीं वो कौन था जिसने इतनी गाढ़ी और लम्बी रातें काटी थीं ? पता नहीं सबसे पहली बार सूर्य कब उगा था...

पता नहीं.

रात के पैरों पर जब लोहे के बाट बंधे हो और उसका चेहरा कोयले से भी ज़्यादा काला हो, तब दिन उगने की राह नहीं तकना होता, तब स्वयं सूर्य बन कर जलना होता है.

एक दिन मैं सूर्य बन कर जल उठूँगी.

[ बावन चिठ्ठियाँ ]

18 टिप्‍पणियां:

  1. अपने समकालीन युवाओं से बहुत अलग हैं ये कविताऍं। बधाई बाबूशा ।

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  2. किसी को इतने रतजगे न दो कि वो पक्की नींद का पता ढूंढें...सवालों से मात खाने, दिन उगने की राह तकने के बजाय स्वयं सूर्य बन कर जल उठने का साहस देती कविताएँ..

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  3. बाबु इसे पढ़कर मन अवसाद से भर गया. दुःख की अति ऐसे आत्महंता कदम उठाने के लिए बाध्य कर देती है. बहुत से जान -पहचान के लोगों को असमय जाते देखा है. मन की गुत्थियाँ सुलझाना बहुत कठिन है. जो जितना संवेदनशील होता है जीना उसके लिए उतना ही कठिन होता है. तुमने मौत को कविता बना दिया है जिसमें टूटती सांसों का छंद है.

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  4. आख़िर शान्ति और सन्नाटे में कोई तो फ़र्क होता है... यह कविताएँ इस फर्क की तमीज सिखाती हैं... सुंदर कविताएँ... बधाई.

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  5. विस्मय, आवेश और प्रेम से लबरेज कविताएं बार-बार भरी बाल्टी कि तरह कुए से बहार आता हूँ और खाली होकर फिर तलहटी में गिरता हूँ।

    _Aharnishsagar

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  6. मंज़िल न दे , चराग़ न दे , हौसला तो दे ...... :)

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  7. बहुत सुंदर कविताएँ। बधाई बाबूषा जी को

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  8. सशक्त और प्रभावशाली प्रस्तुती....

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  9. पहले जला
    फिर सूरज बना
    तुम सूरज बनकर जलना चाहते हो
    तुम्हारे विद्रोह का अंदाज़ निराला है
    खोना कम और पाना ज्यादा चाहते हो |

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  11. ज़माने की पीड़ा को छाती से लगाये वह प्रचंड आत्मविश्वास के सूर्य की तरह अंधियारे को ललकारती इस अंधकार-सागर में कूद पड़ी है ! ...बाबुषा को हार्दिक बधाई !

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  12. बयानगी की बेजोड़ कला है बाबुषा की कविताओं और उनकी काव्‍य-भाषा में, तकलीफ को इतने भीतर उतर कर हूबहू उकेर देना कोई इस बेतकल्‍लुफ बयानगी से सीखे। " आख़िर शान्ति और सन्नाटे में कोई तो फ़र्क होता है" कितनी गहरी व्‍यंजनाएं छिपी हैं इन उक्तियों में - " सन्नाटे न तोड़े गए तो जम्हाई आती है कि बत्तीस साल बहुत से सवालों की उम्र होती है." या कि "वो इने- गिने ही रास्ते हैं, जिन पर सांसें सरपट दौडती हैं. मौत हज़ारों-हज़ार तरीक़े से अपनी ओर रिझाती है." जीओ बाबुषा।

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  13. इतनी अच्छी कविताओं के लिए बाबुषा को बधाई। अपर्णा दी आपका बहुत धन्यवाद।

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