वल्लरी ::



























1

मेरी सीढियों पे कल की बारिश के बाद,
अलसाये पत्ते बिखरे थे.
तुम शाम की गंध से मेरे भीतर,
अलसाये अजगर से लिपटे रहते हो.

कटे नाखूनों से,घटते चाँद से तुम ओझल हो रहे हो.

बातों के टुकडो की चुभन मुट्ठी में समेटे,
खामोश,उस झील के किनारे खड़े हो,
जहाँ आखों की पुतलियो सी काली रात में
कांपती घास बनती है मछलियों का भोजन,
और मछलियाँ उस भेडिया का जो निष्ठुरता का
परिचय है.
मैंने काफी आवाजों को ,
मुट्ठी मैं क़ैद कर रखा है.
फिसलते हैं गिरह से कई टुकड़े.

मैंने लोगों के झुरमुट में

तुम्हें सूरज के साथ उगते देखा है, सुर्ख लाल,
मेरी भृकुटियों के बीच
आ सिमटते हो तुम.
काठ के चर्कुठ बक्से मे बंद ,
ले जा रहे थे मेरा शरीर.

आत्मा भ्रमण पर निकली,

सोच ने  हठ किया साथ जाने का,
समझाया तो, मुंह फुला, कोने मे मुट्ठी सी सिमट गयी.

स्वार्थी हो गयी हूँ मैं,

तू चली गयी तो मरे हुए जानवर के बदबू सा होगा मेरा आस्तित्व.

एक चहकती हुई गौरैया के क़दमों से
ख्वाहिश  ने मन में घोसला बना लिया ,
कल शाम से

जाने भाप बन कर उड़ जायेगा या

हाथ बनकर साथ रहेगा.


उंगलियों से बेमेल शायद थे वो
रास्ते.......

बेमेल गिरहो में पनपते शायद थे वो
रास्ते.......

पत्थरों पे
काई से फिसलते शायद थे वो
रास्ते ....

ओस की बूँद पर धूप की परछाई के साथ
सूखते शायद थे वो
रास्ते.....!




तिनकों से भरी मुट्ठी को लिए
बिना चुभन के
पृथ्वी की ओर नेह से निहारती.......

जब आया वो..
तो सुबकती हवाओं को भी जलन हुई थी
बर्फ तक जलन से नीर हुई

और मैं!
मैं...जैसे किसी हरे भरे खेत के बीच - ठूंठ

जीवन सी शर्मा रही थी.








कुछ तिनके उठा
कुछ बातें समेट
कुछ किस्से उठा
कुछ ताने समेट
कुछ हिस्से चुरा
कुछ हिस्से समेट
फितूर सी...इंसानियत....
इंसानों से भागती हाय...आज फिर इंसानियत

सोच कैद संदूक में
इंसानों के फितूर का
क्या फितूर का मतलब समझती इंसानियत,,,

खरोचती इंसानियत
बिलखती इंसानियत
गीद्ध का निवाला बनती
हमारी इंसानियत...!!

बिखर चुके है तिनके
बिखर चुके है किस्से
बिखर चुके हैं हिस्से
न जाने कब समेटेगी
बातें,ताने,वादे...इंसानियत

खुरच कर नींद को आई
फिर इंसानियत.....
न जाने कब पनपेगी.....
मन के पेड़ में इंसानियत....!!!

संदूक में सुराख़ है
सोच फिर आजाद है

इंसानों के साथ आजाद सी इंसानियत












(painting by Frida Kahol) 

17 टिप्‍पणियां:

  1. बधाई वल्‍लरी.....इस प्रथम प्रकाशन पर बधाई और शुभकामनाएं....

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  2. बधाई.
    पहली बार पढ़ा वल्लरी को. कविताएँ सु गठित हैं और फ्रेश लगी. पहली कविता का गठन लाजबाब है.
    मेरी सीढियों पे कल की बारिश के बाद,
    अलसाये पत्ते बिखरे थे.
    तुम शाम की गंध से मेरे भीतर,
    अलसाये अजगर से लिपटे रहते हो.

    कटे नाखूनों से,घटते चाँद से तुम ओझल हो रहे हो.
    बातों के टुकडो की चुभन मुट्ठी में समेटे,
    खामोश,उस झील के किनारे खड़े हो,
    जहाँ आखों की पुतलियो सी काली रात में
    कांपती घास बनती है मछलियों का भोजन,
    और मछलियाँ उस भेडिया का जो निष्ठुरता का
    परिचय है.

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  3. वल्लरी की कविताओं में प्रकृति से लिए गए बिम्ब नयापन लिए हुए हैं और घटती इंसानियत के प्रति चिंता संवेदनशीलता को दर्शाती है.रास्ते और रिश्ते समान लगते हैं क्योंकि दोनों फिसलते जाते हैं.

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  4. संदूक में सुराख़ है
    सोच फिर आजाद है :)

    खूबसूरत आज़ाद शब्द!

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  5. वाह, वाह !
    क्या बात है !!
    इसी तरह सृजन से जुड़ी रहें !!!

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  6. अरे ... तुम भी कविता की कतार में आ खड़ी हुई? बहुत खूब। बहुत बधाई।

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  7. तुम शाम की गंध से मेरे भीतर,
    अलसाये अजगर से लिपटे रहते हो................ मैंने काफी आवाजों को ,
    मुट्ठी मैं क़ैद कर रखा है...... इन पंक्तियों से आपने मेरा दिल खुश कर दिया है ! इन पंक्तियों में आपके हस्ताक्षर हैं .... शुभकामनाएँ वल्लरी जी ... मुबारक इन कविताओं के लिए

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  8. Aise hi likhte raho, kalam or syahi dono ko tumse pyaar hai, akshar khud-bakhud lipat jayenge panno se, bus likhti raho.

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  9. जंगली फूलों की-सी अनगढ़ता और वैसा ही आकर्षण......कविता की फुलवारी में इस नये फूल का स्वागत....
    आशा करते हैं जल्द ही वल्लरी की और भी कविताएं पढ़ने का मौका मिलेगा...अनंत शुभकामनाएं!

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  10. बहुत प्यारी मगर परिपक्व...कवितापन का पूरापन लिए हुए, वल्लरी बधाई, आज तुम्हारे पापा से ज़िक्र हुआ इन कविताओं का जब वि.हि. सम्मेलन की काग़जी कार्यवाही के दौरान सुलभ जी वहाँ मिले... मनीषा कुलश्रेष्ठ

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  11. ''एक चहकती हुई गौरैया के क़दमों से
    ख्वाहिश ने मन में घोसला बना लिया ,
    कल शाम से

    जाने भाप बन कर उड़ जायेगा या
    हाथ बनकर साथ रहेगा.''.............!!! पिता की राह पर...!! आश्चर्य... आत्मसुख... हार्दिक बधाइयाँ बेटी वल्लरी !

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  12. "मैंने लोगों के झुरमुट में
    तुम्हें सूरज के साथ उगते देखा है, सुर्ख लाल,
    मेरी भृकुटियों के बीच
    आ सिमटते हो तुम." प्रकृति और मानवीय रिश्‍तों के बीच गहरी आत्‍मीयता की तलाश में उभरते ये काव्‍य-बिम्‍ब वल्‍लरी की कविता को अलग रंगत देते हैं, इन्‍सानियत को पनपते देखने की आकांक्षा इन कविताओं को एक और वृहत्‍तर आयाम देती हैं। शुभकामनाएं।

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  13. काफ़ी देर से आया यहाँ (हालांकि पहले दिन सिर्फ़ सरसरी तौर पर देख लिया था), इसके लिए क्षमा चाहूंगा। सबसे पहले तो वल्लरी को बधाई। संभवतः पहली बार वल्लरी की कविता हम सब के सामने आई है।
    ग़ज़ब की ताज़गी है इन कविताओं में।

    "मेरी सीढियों पे कल की बारिश के बाद,
    अलसाये पत्ते बिखरे थे.
    तुम शाम की गंध से मेरे भीतर,
    अलसाये अजगर से लिपटे रहते हो"।

    "कटे नाखूनों से,घटते चाँद से तुम ओझल हो रहे हो.
    बातों के टुकडो की चुभन मुट्ठी में समेटे,
    खामोश,उस झील के किनारे खड़े हो,
    जहाँ आखों की पुतलियो सी काली रात में
    कांपती घास बनती है मछलियों का भोजन,
    और मछलियाँ उस भेडिया का जो निष्ठुरता का
    परिचय है"।

    रचनाकर्म जारी रहे इसकी शुभकामनाएँ।

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  14. कुछ दिन पहले मुझे ये आभास हुआ कि जीवन मेँ हम जिस दुखद पल से डरते रहते हैँ वह एक साए कि तरह हमारा पीछा करता है
    सँयोग से जीवन के हर मोड़ पर हमसफर कि तरह हमे धोखा मिलता है
    अपकी कविता पढ़ के लगा कि ये मेरे नजदीक से गुजरी है

    किस निष्ठुरता कि बात करुँ?
    जग ही निष्ठुर अब लगताहै, कोई कितना भी जुडना चाहे,
    उतना ही ये दुर्धर लगता है,
    निर्मोही मेँ मोह कहाँ?,
    कहाँ बंधता वह बँधन मेँ?
    किसमे इतनी शक्ति व्यापित?
    जो लिपट सके उस चँदन मेँ

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