लीना मल्होत्रा::














मैंसहमत नहीं थी::


नदी की लहरों
मैं नहीं बन पाई मात्र एक  लहर
नहीं तिरोहित किया मैंने अपना अस्तित्व नदी में
तुम्हारे जैसा पाणिग्रहण नहीं निभा  पाई मैं
इसलिए क्षमा मांगनी है तुमसे.

वृक्षों तुमसे नहीं सीख पाई दाता का जीवन
तुम्हारे फल, छाया और पराग देने के पाठ नहीं उतार पाई जीवन में
मेरी आशाओं के भीगे पटल पर धूमिल पड़ते तुम्हारे सबकों से क्षमा मांगनी है मुझे.

सूरज को पस्त करके लौटी गुलाबी शामो
तुम्हे  गुमराह करके 
अपने डर के  काले लबादों में ढक कर तुम्हे काली रातों  में बदलने के जुर्म में
क्षमा मांगनी है तुमसे

क्षमा मांगनी है कविता के उन खामोश  अंतरालों से
जो शब्दों के आधिपत्य में खो गए 
उन चुप्पियों  से
जो इतिहास के नेपथ्य में खड़ी रही बिना दखलंदाजी के
उन यायावरी असफलताओं से जिन्होंने समझौते की ज़मीनों पर नहीं बनाये घर

उन बेबाक लड़कियों से क्षमा मांगनी है मुझे जो मुस्कुराते हुए चलती है सड़क पर
जो बेख़ौफ़ उस लड़के की पीठ को राईटिंग पैड बना  कागज़ रख कर लिख रही है शायद कोई  एप्लीकेशन 
जो बस में खो गई है अपने प्रेमी की आँखों में
जिसने उंगलिया फंसा ली है लड़के की उँगलियों में
उन लड़कियों के साहस से क्षमा मांगनी है मुझे


जिनकी निष्ठा बौनी पड़ती रही  नैतिकता के सामने     
जो आधी औरतें आधी किला बन कर जीती रही तमाम उम्र
जिन्हें अर्धांगिनी स्वीकार नहीं कर पाए हम
जिनके पुरुष  नहीं बजा पाए उनके नाम की डुगडुगी
उन  दूसरी  औरतो से क्षमा मांगनी है मुझे.  

मुझे  क्षमा  मांगनी  है  
आकाश  में  उडती  कतारों के अलग  पड़े  पंछी से 
आकाश का एक कोना उससे छीनने के लिए
उस पर अपना नाम लिखने के लिए
उसके  दुःख में अपनी सूखी आँखों के निष्ठुर  चरित्र  के लिए

रौंदे गए अपने ही  टुकड़ों से
अनुपयोगी हो चुके रद्दी में बिके सामान से,
छूटे और छोड़े हुए रिश्तों से अपने स्वार्थ के लिए क्षमा  मांगनी है मुझे

नहीं बन पाई सिर्फ एक भार्या, जाया और सिर्फ एक प्रेयसी
नहीं कर पाई जीवन में बस एक बार प्यार
इसलिए क्षमा मांगनी है मुझे तुमसे
तुम्हारी मर्यादाओं का तिरस्कार करने के लिए .
घर की देहरी छोड़ते वक्त तुम्हारी  आँखों की घृणा  को अनदेखा  करने के लिए
तुम्हारे मौन को मौन समझने की भूल करने के लिए
मुझे क्षमा मांगनी है तुमसे!



प्यार में धोखा खाई लड़की::


प्यार में धोखा खाई किसी भी लड़की की

एक ही उम्र होती है,

उलटे पाँव चलने की उम्र!!

वह

दर्द को


ऊन के गोले की तरह लपेटती है,

और उससे एक ऐसा स्वेटर बुनना चाहती है

जिससे

धोखे की सिहरन को

रोका जा सके मन तक पहुँचने से!!


शुरू में

वह

धोखे को धोखा

दर्द को दर्द

और

दुनिया को दुनिया

मानने से इनकार करती है

वह मुस्कुराती है

देर तक

उसका विश्वास अटूट रहता है

और उसे लगता है

कि

सरहद के पार खड़े उस बर्फ के पहाड़ को

वह अपनी उँगलियों

सिर्फ अपनी उँगलियों की गर्मी से

पिघला सकती है

फिर

टूटता है विश्वास,

दुनिया

टूटती

है

लड़की.

दिन दिन नहीं रहते,

रातें , रातें नहीं!

वह

रात के दो बजे नहाती है

और खड़ी रहती है

बालकनी में सुबह होने तक,

किसी को कुछ पता नहीं लगता

सिवाय उस ग्वाले के

जो रोज़ सुबह चार बजे अपनी साइकिल पर निकलता है !

उसका

दृश्य से नाता टूटने लगता है

अब वह चीज़ें देखती है पर कुछ नहीं देखती

शब्द भाषा नहीं ध्वनि मात्र हैं

अब वह चीज़ें सुनती है पर कुछ नहीं सुनती

करती है पर कुछ नहीं करती,

वह गूंगी बहरी अंधी लड़की,

होने अनहोने से परे

धोखे से भागती नहीं....

धोखे को

पर कोई नहीं जानता ...

क्योंकि वह मुस्कुराती है

शायद ग्वाला जानता है

शायद रिक्शा वाला जानता है

जिसकी रिक्शा में वह

बेमतलब 

घूमी थी पूरा

दिन.


शायद माँ जानती है

कि उसके पास एक गाँठ है

जिसमें धोखा बंधा रखा है

प्यार में धोखा खाई लड़की

शीशा नहीं देखती

सपने भी नहीं

वह डरती है शीशे में दिखने वाली लड़की से

और सपनों में दिखने वाले लड़के से,

उसे दोनों की मुस्कराहट से नफरत है

वह नफरत करती है

अपने भविष्य से

उन सब आम बातों से

जो

किसी एक के साथ बांटने से विशेष हो जाती हैं .

प्यार में धोखा खाई लड़की का भविष्य

होता भी क्या है

अतीत के थैले में पड़ा एक खोटा सिक्का

जिसे

वह

अपनी मर्ज़ी से नहीं

वहां खर्च करती है

जहाँ वह चल जाए .




उसे भी तेरी तरह उंचाइयां पसंद थी ::


तू अब स्तब्ध क्यों है पहाड़ ??

तेरे अहंकार की गठरी

तेरे प्रेम से बड़ी थी /

तूने अपने कटाव

अपनी ढलान प्रस्तुत कर दी

बह जाने दिया नदी को काल के गर्त में समां जाने के लिए

एक आवरण की तरह लपेट भी सकता था तू उसे

तेरे इर्द गिर्द घूमती रहती

उसे भी तेरी तरह उंचाइयां पसंद थी /

अधूरे तिलमिलाते प्रेम से उपजे तेरे श्राप को

तू थाम भी सकता था

अपनी गर्वीली चोटियों के गर्भ में दबा देता कहीं

जला देता ऋषियों के तपों से उपजी धूनी में

तेरी छाती तो बहुत बड़ी थी

झेल लेता वो आघात

पी जाता अपना क्रंदन

पर

किसी संकुचित सामंती पुरुष की तरह

तूने रचा षड्यंत्र,

-तेरी सिद्धियों को परखने की कसौटी नहीं -

उसे घुटनों पे लाने के

तेरे प्रयास का हिस्सा था वो श्राप

तू जलता था पहाड़

तुझे लगा की उसका वेग तेरी ढलान से उपजा है

और उसने तेरा शोषण किया है

और वह दंड की अधिकारिणी है

पर उसने

  सपनों की चमकदार तलवारों से कटी

धूल धूसरित खंडित वास्तविकता को

स्वीकार कर लिया है पहाड़ !

अपनी यात्रा के अंत तक

शापित नदी

ढोएगी पिंडदान

और

उन मृत देहों की अस्थियों के साथ -साथ बहती कराहती आत्माओं को

देगी दिलासा

कि

तिलांजलि स्वीकार करो /

और अब तू स्तब्ध है पहाड़ !

कि बह क्यों गई शालीनता से

क्यों नहीं देखा

उसने

पीछे मुडके एक भी बार.



वो जो सीता ने नहीं कहा::

 
मैं ये जानती हूँ

मेरे राजा राम

कि

सत्ता और प्रभुता का विष

बहुत मीठा है

जहाँ

ज़िन्दगी की बिछी बिसात पर

तुमने

स्वयं अपने ही मोहरे को पीटा है

और

यह भी जानती हूँ

कि त्याग का दुःख

त्यागे जाने की पीड़ा से बहुत बड़ा है

तभी तो

अपने मन के निन्यानवे हिस्सों की आहुति

तुम्हारे कर्त्तव्य के अग्निकुंड में दे दी मैंने.

मेरे मन के सुकोमल हिस्सों पर खड़ी

इस अडिग अयोध्या में

तुम्हारी मर्यादा तो रह गई मेरे राजा राम

किन्तु

मेरे मन का सौवाँ हिस्सा आज तुमसे यह पूछता है

कि

अधिकार क्या केवल उन्हें मिलते हैं

जिन्हें

छीनना आता है.

मेरे मन के निन्यानवे हिस्सों को

तुम्हारे दुःख में

सहज होकर जीना आता था

किन्तु

मेरे मन का

यह जिद्दी, हठी, अबोध सौवाँ हिस्सा

आज

अधिकार से ,

मनुहार से ,

प्यार से तुमसे यह पूछता है

कि

राजा के इस अभेद्य कवच के भीतर

तुम्हारा एक अपना

नितांत अपना मन भी तो होगा,

तुम्हारे

उसी मन के भीतर पलने वाला

अपराध बोध

यदि

एक दिन इतना बड़ा हो जाए

कि

तुम

राज्य , धर्म, और मर्यादा की सब परिभाषाएं

और अर्थ भूलकर एक दिन मेरे पास मेरी तपोभूमि में

लौट आना चाहो

तो

क्या तुम सिर्फ इसलिए नहीं आओगे

कि तुम मुझसे आँख मिलाने का साहस नहीं रखते,

हर बार

तुम

मेरे प्रति तुम इतने निष्ठुर क्यों हो जाते हो राम !!!

तुम्हार कुल !

तुम्हारी मर्यादा !! और अब

तुम्हारा ही अपराधबोध !!!

तुम्हारा यह स्वार्थ

तुम्हारे पुरुष होने का परिणाम है

या

मेरे स्त्री होने का दंड ??

मैं

यह कभी जान नहीं पाई

इसलिए

आज मेरे मन का यह सौवाँ हिस्सा तुमसे यह पूछता है .


 
क्षणिका::

 

एयर कन्डीशनर की

थोड़ी सी हवा चुरा के रख दी है

मैंने

तुम्हारी पसंदीदा किताबों में

जब

ज्येष्ठ की दुपहरी में

बत्ती गुल हो जाएगी

और

झल्ला कर खोलोगे

तुम किताब

तो तुम्हे ठंडी हवा आएगी :)

24 टिप्‍पणियां:

  1. 'मैं सहमत नहीं थी'निश्चित रूप से एक अच्छी कविता है, शिल्प तथा भाव दोनों दृष्टि से,
    "तुम्हारे मौन को मौन समझने की भूल करने के लिए
    मुझे क्षमा मांगनी है तुमसे!"

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  2. अच्छे शिकायती तेवरों की रचनाएँ !

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  3. इसमें कोई शक नहीं कि लीना मल्‍होत्रा अपनी अभिव्‍यक्ति के प्रति गहरी सोच रखने वाली कवयित्री हैं, मैंने इनके ब्‍लॉग पर प्रस्‍तुत अधिकांश कविताएं पढ़ी हैं और समय समय पर अपनी राय भी जाहिर करता रहा हूं। आशीष ने सही कहा है कि इन कविताओ में स्‍त्री के साथ समाज में होने वाले बरताव के प्रति लीना की जो शिकायत और वेदना उभरती है, वह गहरे सवालों की ओर इशारा करती हैं, अपर्णा ने अपनी वेब-पत्रिका में लीना को प्रस्‍तुत कर इसकी परिधि को और विस्‍तार दिया है। मुझे इन कविताओं की इस तरह प्रस्‍तुति प्रभावशाली लगी। लीना जी को तो इन अच्‍छी कविताओं के लिए बधाई देनी ही चाहिये।

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  4. बहुत ही संवेदनशील रचनाकार हैं लीना जी... उनकी कविताएँ नए सिरे से सोचने के लिए विवश करती हैं....

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  5. अनुभूति और कला के संतुलन से ही कविता लिखी जाती है. यह संतुलन अभ्यास और अध्यवसाय से ही संभव है.. , अनुभूति के लिए आत्मसंघर्ष लाजमी हैं. लीना की कविताएँ उम्मीद जगाती हैं.

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  6. बहुत सुन्दर पंक्तियाँ.......मर्म को छूनेवाली....

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  7. kavitayen shaandar hain. behtreen rachnayen. bhavnon ka or shabdon ka achha samanvay hai. aapki panktiyon se soch badalti hai. kuch ek panktiyon ka falak vistrit hai or vishesh roop se hamara dhyan aakarshit karti hain. Pyar me dhoka khayee ladki.. shabdo ke chayan me achhi satartkta barti hai.. Wo jo seeta ne nahi kaha... kavita bolti hai, samvad karti hai samay se, ham se. rishton ko dekh kar nahi, varan rishto ko soch kar or anubhav kar kavitayen likhi hain. Bhavnatamak, sunder, sateek or kalatmak rachnaon ke liye badhayee. bohat sunder.

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  8. बहुत ही सुन्दर कवितायें

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  9. आपकी पोस्ट आज के चर्चा मंच पर प्रस्तुत की गई है
    कृपया पधारें
    चर्चा मंच{16-6-2011}

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  10. क्षमा मांगनी है ,वो जो सीता ने नहीं कहा ,उसे भी उचाइयां पसंद हैं ...सभी बेहतरीन कवितायें

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  11. वह दर्द को ऊन के गोले की तरह लपेटती है
    और उससे एक ऐसा स्वेटर बुनना चाहती है
    जिससे धोखे की सिहरन को रोका जा सके
    मन तक पहुँचने से!!

    क्या बात है! कमाल की अभिव्यक्ति...
    शुभकामनाएं।

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  12. बहुत सुन्दर रचनाएं...बहुत भावपूर्ण और मर्मस्पर्शी..शुभकामनायें..

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  13. मै आभारी हूँ सभी मित्रों की जिन्होंने मुझे सराहा, स्नेह दिया. धन्यवाद दोस्तों. अपर्नाजी बहुत धन्यवाद.

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  14. प्रेम मे धोखा खाई लड़की दर्द की गाँठे ढोती रहती है. दर्द जो आप ताक़त देती है. ऊँचाई देती है. असर्दार कविताएं.

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