फाल्गुन









रंग-आनंद ::

यह समय का तिलिस्म है
कि जन्मजात कौशल
कि मुस्कुराते ही मेरे खिल उठते है जहान् के सारे रंग।

इक तुम्हारे प्यार का रंग
इक तुम्हारे धिक्कार का रंग
इक तुम्हारे इसरार  का रंग
इक तुम्हारे अबरार का रंग

इक तुम्हारे हौसलों का रंग
इक तुम्हारे मौसमों का रंग
इक तुम्हारे चोचलों का रंग
इक तुम्हारे जुल्मों का रंग

इक तुम्हारे खेलने का रंग
इक तुम्हारे धकेलने का रंग
इक तुम्हारे खोलने का रंग
इक तुम्हारे बिखेरने का रंग

इक तुम्हारे खुशी का रंग
इक तुम्हारे हँसी का रंग
इक तुम्हारे कुशी का रंग
इक तुम्हारे फँसी का रंग

इक तुम्हारे ताकत का रंग
इक तुम्हारे हिकारत का रंग
इक तुम्हारे लानत का रंग
इक तुम्हारे सियासत का रंग

इक तुम्हारे बोझ का रंग
इक तुम्हारे सोच का रंग
इक तुम्हारे सोझ का रंग
इक तुम्हारे मोच का रंग

और ये सारे रंग बमक उठते हैं जब
तुम भी मुस्कुराते हो, मेरी मुस्कुराहटों में!

अध्यात्म ::

ढूँढ़ता हूँ
सम पर
विषम पर
मद्धिम पर
उच्च पर
निम्न पर

जैसे ही पाता हूँ खुद को
पिघल जाता हूँ
देखता हूँ खुद को बहता हुआ
कलकल-झरझर

मेरे समूचे वजूद में
झंकृत हो उठता है मौन
कहीं सुर में
कहीं लय में 

लेती हैं आलाप साँसे
और तल्लीनता
तुम्हारे हृदय के तारों को खींचकर
मेरे अध्यात्म से जोड़ देती हैं।

आलिंगन ::

मैंने भींच लिया है समय को अपनी बाँहों में
मुझमे सूरज को मुट्ठियों में कर लेने का हौंसला है
मेरी निश्चल मुस्कान में है तुम्हारे प्राण हरने की ताकत
संभल जाओ कि उठ पड़े हैं मेरे कदम
थमेंगे तभी जब कर चुकेंगे तुम्हारा मान-मर्दन

कहाँ हो तुम::

अब तो तुम्हारी छवि भी स्मृतियों से धूमिल होने लगी है
दिन में एक बार
उस मोड़ से गुजरना ही होता है मुझे
जहां तुम्हें हँसते देखकर
गिर पड़ा था वह सांवला बाइक सवार अपनी होंडा सीडी हंड्रेड से
उस पुल पर से भी
जिस पर न जाने कितनी ही बार
ठहर गया था समय
तुम्हें गुजरते देख

तुम्हें याद है
मुकेश का वह दर्दीला गीत
'दीवानों से ये मत पूछो...'
जिसकी अंतिम दो पंक्तियाँ
मैं अपनी नाक दबा कर गाता था
और तुम गीत के तमाम दर्द को महसूसने के बावजूद
खिलखिला कर हंस पड़ती थी

हिस्लॉप कॉलेज के प्रांगण
में उस रोज जब
बहुत दिनों बाद देखा था मैंने और तुमने 
एक-दूसरे को
तो हमारे चेहरे के लाली चुराकर भाग गया था
सूर्य आकाश में
याद है न तुम्हें!

कैसी हो तुम या कैसी होगी?
इस सवाल का जवाब कभी नहीं ढूँढा मैंने
तुम्हें ढूंढते हुए भी
लेकिन मुझे हमेशा अंदेशा लगा रहता है कि
कहीं घट न रही हो
तुम्हारे मुस्कान की लम्बाई इस कठिनतम दौर में

तुम्हारे चेहरे का हर शफा 
मैं लगभग भूल चूका हूँ
सिवाय तुम्हारे मुस्कान के
भूल चुका हूँ सारी बातें
सिवाय उस मौन के जिसे
तुमने कभी नहीं तोड़ा
मैंने तोड़ना चाहा तब भी

एक बार और देख लेने की तमन्ना है तुम्हें
क्योंकि मेरी ही तरह बदल गई होगी
तुम्हारी भी डील-डौल
और अब हिचकियाँ तुम्हें भी
होली-दिवाली पर ही आती होंगी

एक बार और देख लू तुम्हें
तो कम से कम कुछ दिन तो
आराम से सो पाउँगा
पिछले सत्रह सालों से नहीं सोया हूँ
सुना तुमने?


9 टिप्‍पणियां:

  1. कविता में रवानी है ... यह पढ़ा ले जाती है...
    देशज का आत्मविश्वास..
    बधाई

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  2. जन्मजात कौशल सा ये प्रवाह कविता का सौन्दर्य है...शुभकामनाएं

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  3. शैल अग्रवाल22 जून 2011 को 1:00 pm

    अच्छी लगीं कविताएं...हक, जिद,उदास बेचैनी सभी कुछ।

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  4. खूबसूरत पंक्तियाँ और भावपूर्ण. बधाई.

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  5. कवितायेँ अच्छी और अनूठी लगीं जीवन के विभिन्न आयामों की गवाही देती हुई ! बधाई !

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  6. बहुत ही भावपूर्ण-प्रवाहपूर्ण रचनाएं... बधाई...

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  7. मैं सोचता हूँ कि जब हम शैली, कीट्स, विलियम वड्सवर्थ को पढ़ते हैं, निराला को भी, तो संवेदनाएं ऐसे ही प्रवाहित होती हैं कि ह्रदय का हर तार झंकृत हो जाए. ये जो समय है, उसमें जरूरी है, हम पद्य को फिर से उसके अनिंद्य सौंदर्य में पुनः प्रवाहित करें. मैं आपकी कविताओं को महसूसते हुए अंतर में वही भाव पा रहा हूँ.

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  8. पिछले सत्रह सालों से नहीं सोया हूँ
    सुना तुमने?

    waqt aaj bhi thehra hua sa hai shayad

    behad saral shabdon mein umdaa maarmik chitran man bhaav ka

    aap bhi aaiye

    abhaar

    Naaz

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