बाबुषा






लड़की कहती है कि ये पांच गद्य गीत हैं , मेरे अड्डे के लिए. मेरे फूलों के लिए और मैं सोचती हूँ कि मैं इन गीतों को कहाँ सहेज लूँ -अभी मेरी गज कमान वॉयलिन का पेट चीरेगी और अभी ये गीत दिल के आर पार होगा. अभी -अभी खमाज  से लड़ -भिड लड़ भिड करुँगी मैं और ये गीत मेरे गले का विप्रलंब होगा.
घंटी की टन टन होती रही और मेरा मन न हुआ कि इस स्कूल से भाग छूटूं . पढ़ाने वाली भी यही लड़की और मेरे बस्ते को ठीक करती हुई भी यही लड़की .
यही लड़की मेरी धाय कि जाड़ा ज्यादा तो नहीं हो गया -लाओ जुराब पहना दूँ . लाओ दस्ताने और टोपी भी और इस तरह मेरी बुजुर्गियत में बचपन घोल कर शरबत बनाती रही मुझे .
यही लड़की जो मुझे मेरी नादानियों पर सज़ा सुनाती है -जाओ बार -बार इन्हीं सीढियों से चढ़ो-उतरो. खुद फैसला करो, खुद सज़ा दो और चुपचाप कंकड़ वाली राह में मिट्टी ओढ़ कर सो जाओ -दुनिया सोती है, दुनिया ओढती है -तुम क्या सतमासी हो जो कुम्हला जाओगी और मैं नौ महीने की परिक्रमा करके इस लड़की का चेहरा देखने लगती हूँ - अब आगे क्या करूँ ? बता न .
और तब ये हंसती है . और तब ये उतने ही जोर से रोती है -चार्ली हमकु कुछ नहीं पता . तू बोल न !



एक शहर की डायरी :


घंटी की टन-टन बस्ते में भर ली. गलियारों में दौड़ते एक जोड़ी पैरों के निशान ढूँढते रहे. खटमिट्ठी बेर-सा बचपन बीनते रहे. सड़कों पर बिखरी शरारतें समेटते रहे.

देर तक रोते रहे...

आधी रात घबरा कर उठ बैठे. तकिये के नीचे दबा हुआ वादा निकाला. घुटनों पर बैठे दुआ पढ़ते रहे. आँखें  बहती रही, सितारे टूटते रहे. पागलों से हम क़समें चूमते रहे.

थान से एक मीटर हवा काट ले आए, झबला सिया और ख़्वाब को पहना दिया.
धानी दुपट्टा तार -तार किया. ख़्वाबों का पैरहन सहेजते रहे.

***
पेचीदा गलियों में घूमते रहे. घंटों तक बालों से खेलते रहे. आईने में ख़ुद को निहारते रहे. ख़ुद को देख कर लजाते रहे. पैरों के दर्द को सोखते रहे. कॉलर में काजल को पोंछते रहे.

बेवजह हँसते रहे, क़िस्से कहते रहे. धमनियों में बेज़ुबान दर्द को सहते रहे.

सौ दफ़ा छाती पर नाम उकेरा. छिली उँगलियों में आँखों की नमी बाँध ली.
मुठ्ठी भर साँस से प्याला भर लिया. सर्द दिन में घूँट -घूँट पीते रहे.

***
सलाइयों में साँझें उतारते रहे, रातों को फंदे गिराते रहे. एक क़ीमती स्वेटर बुनते-उधड़ते रहे. आँखों में ख़ुद को दर्ज किया और बाँहों में ख़ारिज करते रहे. आसमान पर सवाल दागे और सूरज के सीने में जलते रहे.

मोगरे की तरह महकते रहे.

किससे कहें और क्यों कर कहें कि मौत की तश्तरी पर ज़िंदगी चखी है. टेसू के जंगल में आग लगी है. आँच में मुसलसल झुलसते रहे. कुर्ती में लाल रंग भरते रहे.

***
दूर तक गलियों को तकते रहे. अरमान कभी जमते , कभी गलते रहे. हम गिरते रहे और संभलते रहे.

टैक्सी में ख़ुद को रख कर भूल आए . एक टुकड़ा 'केनी जी' की धुन के सिवा दिन भर कुछ नहीं खाया. भीड़ भी बहुत थी और शोर भी बहुत था. पर दवा पूछने वाला कोई भी नहीं था.

माथे पर अंगारे बरसते रहे. कंबल के अंदर हम सुबकते रहे.

***
पटरियों पर लम्हे सरकते रहे. हम स्टेशन-दर-स्टेशन पीछे छूटते रहे. दिल के जंगल में जुगनू चमकते रहे. मरना, क्या कोई बड़ी बात है ? जीना, मगर हाँ ! बड़ी बात है. अपनी मर्ज़ी से हम साँस लेते रहे. साँस-साँस सदियों को जीते रहे.

पुलिया -पहाड़ों से कहते रहे. नदियों के संग -संग बहते रहे.

एक शहर पैरों में लिपट आया है. उस शहर के पैरों से हम लिपटे रहे.
जूठे मुँह ईश्वर का नाम जपते रहे.

                                          Jean-Francois Millet




माइग्रेन की एक रात :

" लाओ री मालिनिया हरवा
अच्छी नीकी लड़ी मालनिया लाओ
आज सजन संग मिलन बनिलवा "

... कि जैसे एड़ियों की खुजलाहट असह्य हो, कि जैसे विरह का काढ़ा और गाढ़ा हुआ जाता हो, कि जैसे इसे गटके बिना स्वर्ग के द्वार पर ही अटके रहेंगे.

बीतने को पूरी रात पड़ी है और जीतने को कितने स्वप्न ! चटख - सुनहले रँगों वाले ...

निर्दोष-से ये सपने बीत जाते हैं और चतुर लड़ाकू रात जीत जाती है. हज़ार तालों में जकड़ी बैरी इच्छा छटपटाती है. एक कातर सिसकी की गूँज आकाश तक जाती है. सुदूर पूरब में भोर का तारा तड़प कर टूटता है, पर सुबह आती है यूँ कि जैसे फ़र्श पर काँच का गिलास फूटता है !

छन्न !

कोने में जा छिपी किरचें समेटते दिन भी यूँ ही कट जाता है और टहनी से उचक आया चंचल चाँद खिड़की से सट जाता है. जो घड़ी मिलन की थी, वो आँखों में फिर उतरी है. पर बाँझ हुयी है ये साँझ जो बस, यादों में गुज़री है.

एक बार जो तुम आ जाओ तो फिर उम्मीद का नीबू चखूँ . बोलो ! कब तक आले पर मैं आस का दीया रखूँ ?

साँस जलती-फुंकती है, चलती है, रुकती है. 'माइग्रेन' में सिर नहीं, अब छाती दुखती है.

पपीहे की पुकार सुन लूँ तो जान जा सकती है. और ये रात, जो आख़िरी हो तो किशोरी अमोणकर मेरे लिए पूरी रात गा सकती हैं !

कि,

"अच्छी नीकी लड़ी मालनिया लाओ
आज सजन संग मिलन बनिलवा "



                                                                                             









                                                                                                                                                                                                                           William Dyce



जब रुलाई फूटे 

जब रुलाई फूटे, किसी पेड़ से लिपट जाना.
लॉकेट की तस्वीर में बेजान बालू भर लेना.  किसी भूरे पत्थर  को दिल की धड़कन सुनवाना.  इंतज़ार करते हुए लकड़ी की बेंच बन जाना.  बेबस घाटों- सा कट जाना,  कपड़े- लत्तों सा फट जाना. किनारियाँ उठा के सी देना, रहमत का पुल बन जाना.
दुःख को हाँडी में सेंकना, चूल्हे में सीली लकड़ियाँ सुलगाना. लपटों  से अपनी धधक कहना. मुट्ठी भर मिट्टी उठाना, भुरभुरा के ढह जाना.  बारिशों में भीगना, बाग़ों में बरसना, समंदर में बूँद बन फ़ना हो जाना.
दिल निकालना, ब्लैक टी में घोल कर गटक जाना. पपीहे के कंठ में अटक जाना. मज़ारों में हर रंग के दर्द बाँधना.  ख़्वाहिशों को गाय की सींगों में फँसा देना.
रेलवे स्टेशन निकल जाना. भिखारियों का भूखा पेट देखना. हिजड़ों को सूखा पेट दिखाना. उनके दुआओं वाले हाथ जबरन  सिर पर रख लेना. सिक्के बराबर आँसू बन जाना. ग़रीब की कटोरी में छन्न से गिर जाना.
सुनार से एक अँगूठी बनवाना. उस पर मोती बराबर नींद की गोली जड़ देना. आधा गिलास पानी में फड़फड़ाना, छटपटाना और डूब जाना पर महबूब से एक लफ़्ज़ मत कहना.
कंकड़ पीठ में चुभने देना. मिट्टी ओढ़ना, चुपचाप सो जाना.



सूरजमुखी 


माना कि तुम्हारी हथेली में पच्छिम नहीं है. एक लक़ीर अमावस की क्यूँ हरदम चलती रहती है ?
एक काम करोगी आज...
गहरे गले का ब्लाउज़ वो नीला वाला पहनो. जिस पर पीठ तुम्हारी आधे चाँद-सी झिलमिल करती है. लम्बा-सा स्कर्ट वो पीला रेशम-रेशम, जिसकी हद पे सरसों की बाली फूला करती है. हरे रंग के कंगन पहनो. फ़ोन पे उनकी खन-खन भेजो.  कानों में वो आगरा वाले लटकन पहनो. शाहजहाँ की बेतरतीब सी धड़कन पहनो. माँग में गीली शबनम पहनो. कमर में सारे मौसम पहनो.
कच्चा कोयला सीने में फिर से सुलगाओ. धुआँ-धुआँ काजल से तुम बादल बन जाओ. सिर के ऊपर कड़ी धूप है. मेरे शहर में बड़ी धूप है. हँसी की बूँदें छम छम भेजो. इन्द्रधनुष और सरगम भेजो.
जैसे लापरवाही से तुम बाल झटकती हो, हौले से बस! वैसे ही वो बात झटक दो.
ब्लाउज़ के नीचे काँच रंग की जो डोरी है, ज़रा-सा नीचे सरकाओ. चटक -मटक रंगों में तुम नाखून डुबाओ. बायीं तरफ़ हँसली पर जानाँ, हँसते सूरजमुखी उगाओ.
जिस्म- जान सब रौशन-रौशन कर जाएगा. काँधे पे डूब के सूरज आज ही मर जाएगा.


तन तितली मन स्याही 
[ या इलाही से मुख़ातिब ]
किस के बस्ते से ये सारे रंग चुराए. जाने कैसे तुमने इतने रंग बनाए..

कैसे सोचा हरे से भरे पत्ते  होंगे ?   पेड़ों के ये सुंदर कपड़े-लत्ते होंगे.  शँख फोड़ कर क्या तितली के पंख बनाए ? पीले-नीले रंग सफ़ेदी पर छितराए. तितली जा कर फूलों से सौदा कर आयी. पी कर शरबत फूलों में वो रंग भर आयी. आग को रंगते वक़्त तुम्हारा हाथ जला था. बर्फ़ का टुकड़ा हाथ पे अपने ख़ूब मला था. ठंडक पर तुमने कूची फिर खूब चलाई. ठंडा रस भर शाख़ों पर नारंगी लटकाई.
नीली लपटों से थोड़ा-सा रंग निकाला. मुट्ठी भर नीले को फिर दरिया में डाला . धरती की छत पर उस दिन शीशा लटकाया. नीले दरिये ने आँखों को झट मटकाया. दरिया, नदियाँ और  समन्दर शीशे में बहते हैं,  और हम कितने नादाँ ! उस  शीशे को अम्बर कहते हैं. उत्तर से दच्छिन तक तुमने इन्द्रधनुष जो खींचा है. अस्मानी मिट्टी को गीले  सतरंगों से सींचा है. क्या परियों की चिमटी से तारे चमकाए ? जलते-बुझते सूरज के  कैसे रंग बनाए. मिट्ठू मियाँ की कैसे तीखी  चोंच रंगी ? किस कूची से वॉन गॉन्ग की सोच रंगी ?
जाने कैसी -कैसी तो तुम साज़िश करते हो ? यहाँ -वहाँ और कहाँ कहाँ रंगों को भरते हो.
भर दी माटी के पुतले में सारी माया और कुदरत के संग तुमने इक रास रचाया. खेल- खेल में उस दिन तुमने मुझे बनाया. सब रंगों के प्याले में  फिर ख़ूब डुबाया. तन पर मेरे किसम-किसम के रंग लगाते और खुद ही सारे रंगों को धोते जाते. क़दम- क़दम पर धूप-छाँव को खूब जिया है. घूँट-घूँट विष-अमरित संग हर रंग पिया है.
मुझको अपना आज पता दे, कुशल चितेरे राज़ बता दे. बस ! मुझको इक बात बता दे...
कौन कमी इस पुतले में बाक़ी थी, मालिक ? काले को क्या रात नहीं काफ़ी थी, मालिक ? पौ फटने ही वाली थी कि काली चिंदी जोड़ गए. रात अमावस से चोरी कर छाती पर तुम छोड़ गए.
स्याही शीशी में भर कर क्यों मन के भीतर फोड़ गए.


6 टिप्‍पणियां:

  1. बबुषा को पढना अनुभव है और अपर्णा के साथ पढना तो सघन अनुभव. ज़ोरदार जोड़ी.

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  2. इन कविताओं को पढना ऐसा है जैसे मन की स्लेट पर अनेक विचार लिखे और मिटाए जा रहें हों..जिनका कोई निश्चित क्रम नहीं.जिन पर आपका कोई बस नहीं पर जो सच्चे है. इनका बहाव आपको बहा ले जाता है उस निर्जन में जहाँ आप केवल अपने स्वयं के साथ होते हैं. कितने सारे रंग पर बेचैनी का रंग सबसे हावी. इनको पढने के बाद निश्चय ही आपमें कुछ बदल जाता है.

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  3. बाबु के ये गद्य गीत दिल की गहराई से लिखे गए हैं. आवारगी, दर्द के लम्हे, माइग्रेन की अंतहीन रात, रुदन का संगीत, इच्छाओं का सूरजमुखी, प्रकृति से अपनापन और भगवान से कहा- सुनी- बाबुषा ने यहाँ अनेक रंग बिखेरे हैं.

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  4. ऐसी कविताओं और उनके लिए मिले पुरस्कार की रिपोर्ट पर जब ‘कवियत्री’ लिखा देखते हैं तो बहुत अफसोस होता है। ये हैं हमारे साहित्य और संस्कृति के रिपोर्टर। मजे की बात कि पोस्ट खोलते ही सबसे पहला शब्द वही दिखा और मन खिन्न हो गया। इसलिए बोल डाला वरना बाबुशा की कविताएं वैसे भी अलग-अलग मंचों पर पढ़कर नि:शब्द हो चुपचाप निकल लेते हैं हम :)

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  5. बहुत ही सुंदर और सार्थक प्रस्तुति है.
    मेरे ब्लॉग पर भी आपका स्वागत है.
    http://iwillrocknow.blogspot.in/

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  6. लाजवाब। बहुत ही सुंदर अभिव्यक्ति है, बधाई.

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