सईद अय्यूब ::

 

























सबसे सुंदर प्रार्थना::

जब मैं
तुम्हें
प्यार कर रहा होता हूँ,
वह
मेरी सबसे सुंदर प्रार्थना
का
समय होता है





महाकाव्य का सर्ग::
 
तुम,

जीवन पर लिखे गये
मेरे महाकाव्य का
वह
सर्ग थी
जिसमें था
केवल रस,
अलंकार,
सौंदर्य,
प्रेम व
सुख

दुर्भाग्य से

जिस कागज़ पर
लिखा था
मैंने
वह चमत्कारिक सर्ग,
न जाने कहाँ
हो गया है
गुम.



एक नदी, एक धारा::

एक नदी, एक धारा
पर्वतों के बीच से निकली
किलकिलाई,
खिलखिलाई,
उछली-कूदी

इठलाई,
राह का एक पत्थर
उसे देखता रहा
मूक
मंत्रमुग्ध!

नदी,
समतलों
मरुस्थलों से
गुज़री
और
अपने प्रियतम
सागर से जा मिली

मैं
उस पत्थर को
देखता रहा
मुझे
याद आई
एक लड़की
मैंने देखी
एक नदी, एक धारा



तुम मेरे लिए हो::

तुम मेरे लिए हो
उस
रोटी की तरह
जो
भूख लगने पर
सबसे अधिक प्रिय होती है
किसी दूकान के आगे निकले
उस
छज्जे की तरह
जो
राह चलते

अचानक आई बारिश में
सबसे अधिक
अपना लगता है

मेरी सिग्रेट के
उस
आखरी कश की तरह
जो
हमेशा ही,
तुम्हारे पहले चुंबन
की तरह
मज़ेदार होता है
परीक्षा में आये
उस
प्रश्न की तरह
जो पहले से ही
तैयार होता है

उस
अंक की तरह
जिसे
शून्यों की
लम्बी कतार में
जोड़ दिया गया हो
उस
नाराज़गी की तरह
जिसे
अंत में
एक प्यार भरा
मोड़ दिया गया हो

खेल में की गयी
उस
बेईमानी की तरह
जिससे
अक्सर ही
मैं जीत जाता हूँ
जीवन में आये,
गिने-चुने

उन
अवसरों की तरह
जब
उन्मुक्त होकर मैं
कोई
गीत गाता हूँ

तुम मेरे लिए हो
ज़ाएकेदार खाने में
बराबर पड़े
नमक की तरह

थोड़ा कम

थोड़ा ज़्यादा
वास्तव में,
तुम मेरे लिए हो
जीवन की हर
आवश्यकता की तरह

थोड़ा कम

थोड़ा ज़्यादा



हमारी छवियाँ क्या करेंगी::

 
जब मैं
यहाँ नहीं होऊँगा
मेरी कई छवियाँ
परेशान करेंगी तुमको
जब तुम
यहाँ नहीं होगी
तुम्हारी कई छवियाँ
राह आसान करेंगी मेरा
किंतु...
जब,
मैं और तुम
दोनों ही नहीं होंगे यहाँ
हमारी छवियाँ
क्या करेंगी प्रिये!

हमारी छवियाँ क्या करेंगी

मिलन की पहली रात::
[यह उर्दू में लिखी गयी एक नज़्म है. यहाँ केवल लिप्यांतरण किया गया है]

वह मेरी तरफ़ देखने लगी
मैं पिघलने लगा
वह बात करने लगी
मैं चहकने लगा
उसने मुझे छुआ
मैं सरसरा गया
उसने मुझे चूमा
मैं थरथरा गया
वह मुझसे लिपट गयी
मैं महकने लगा
वह हमारे मिलन की
पहली रात थी
हमारे जिस्म के हर हिस्से में
एक अनकही बात थी.

मैं उसके होठों पर
सिग्रेट की तरह जला
वह मेरे सीने पर
जाम की तरह छलकी
मेरी आँखों में
दो सूरज उगे
उसकी आँखों में
चाँदनी हल्की-हल्की

साज बजने लगे
रक्श होने लगा
प्यार का कारवाँ
सूए-मंज़िल चला
एक मंज़िल जो थी

बहुत दूर पर
एक मूसा को जाना था
कोह-ए-तूर पर

कोह-ए-तूर पर
नूर ही नूर था
कुछ था जो
तजल्ली से भरपूर था
उस वक़्त अपना
कोई दुश्मन न था
हम आज़ाद थे
कोई बंधन न था
दीन व दुनिया दोनों से
जुदा हो गए
हम खुदा से मिले और
खुदा हो गए

वह हमारे मिलन की
पहली रात थी
ज़िन्दगी एक
ख़ूबसूरत बात थी


8 टिप्‍पणियां:

  1. स्वागत और बधाई..अय्यूब की कहानी तो पढ़ी थी .. कविता आज देखी.
    इन कविताओं में भावना का आवेग है और भाषा भी सलीके की है. लिखते रहिए..

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  2. man ke komal ahsaaso se uthhi bhavnaaye shabdo me chhalak kar kavitaaye ban gai. kavi ki pukar theek dil par dastak deti hai. sundar. bhav pravan kaitaayen.

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  3. वाह मनोभावो का बहुत ही गज़ब का चित्रण किया है।

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  4. क्या बात है बहुत खूब लिखा है | मुझे काफी इन्तजार था इन सब कवितावो का ......

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  5. प्रेम को वायवीयता के आकाश से उतार कर यथार्थ के धरातल पर अनुभव करने का प्रयास करती हैं ये कवितायेँ ! सुन्दर और सराहनीय प्रस्तुतीकरण !

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  6. sunder kavitaye hai. is muskil samy me kavitaye hi to hai jo hamsabo ko jor ke rakh pati hai. shukriya acchi kavitawo ke liye

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  7. प्रेम को छूने और लफ्जों में पिरोने के लिए अभी लंबी दूरी बाक़ी है किन्तु जहां तक भी ये कवितायें पहुंचती हैं रास्ता बिलकुल साफ़ है बस लगन और धैर्य थोड़ा बनाए रखना होगा. प्रयास बेहद अच्छा लगा.

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