गगन गिल ::





















रुक कर ::

 
रुक कर
उसे देखा

रुकते हुए


फिर ले गई

 पृथ्वी ही

खींच कर उसे

जहाँ कहीं भी .

जा कर ::


प्रतीक्षा करती-करती
सोयी
वह

रोई जाकर

दूसरे
जन्म में

उसके एकांत में ::


उसके एकांत में

वह फेंकती है
कंकर

एक इच्छा का

बिछोह का
एक

आवाज़ उसकी ::


आवाज़ उसकी

बाहर निकलता है
काँटा
आखिर उसकी आत्मा से

एक तुम्हारी सांस है

एक उसका
तार है

उसी में

झूलती है
गिरती -
पड़ती है

मकड़ी -भर

आकांक्षा उसकी

जैसे इतने दिन ::


जैसे इतने दिन

जी
वह

वैसे सारे दिन

जियेगी
उसके बिना

जियेगी  सारे दिन

वह ?


जाते हुए::
 



एक दिन प्रेम आएगा तुम्हारे घर और घर में अन्न न होगा . एक दिन प्रेम आएगा तुम्हारे जीवन में और भर चुके होंगे सब पन्ने . एक दिन प्रेम आएगा तुम्हारे पास और तुम्हे मालूम न होगा ,प्रेम है ये .

बदल गया होगा उसका मुख इस जन्म तक आते-आते . थक गया होगा उसका सिर. भर चुकी होगी उसमें उम्र भर की नींद .

जाते हुए प्रेम देखेगा तुम्हें अजीब खाली आँखों से . मृत्यु के करीब सपनीली हो जायेंगी उसकी आँखें . और गीली .



यह रहा उसक घर ::
१.
ताश के पत्तों का उसका घर
उसके
सिर
पर

हिलता है उसकी नींद में
जब तब

गिर सकता है
कभी भी .

२.
ये रहे उसके पंख
उतार दिए थे उसने
बहुत पहले ही

ये रहे पत्थर
जो अभी तक बंधे हैं
ठूंठ उसके कन्धों पर

वो रहा आकाश
वो रहा देवदूत आकाश में

वह रही आकांक्षा उसकी

साथ उड़ने की .

३.

यह रहा
उसका दरवाज़ा

जो उसने बंद किया
आकांक्षा के मुंह पर

यह रही उँगली उसकी

दरवाज़े में
भिंची हुई 

एक दिन वह जागेगी ::
एक दिन वह जागेगी और पायताने से उठकर जा चुका होगा ईश्वर . एक दिन वह जागेगी और सूख चुकी होगी आँख . उतर चुका होगा खुरंड . थम गई होगी पीड़ा .

एक दिन वह झाँकेगी स्वस्थ होकर दर्पण में और भर जायेगी विस्मय से. घाव के बिना ही वहां बंधी होगी पट्टी एक .
चोट जिसे लगना होगा , अभी होगी बहुत दूर . किसी भविष्य में





6 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत ही उम्दा रचनाएं ...गगन गिल जी को बधाई .. अपर्णा दीदी आपको आभार ..इतनी सुन्दर रचनाएँ पढवाने के लिए.. :)

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  2. गगन गिल राग-विराग-वैराग्य की कवयित्री हैं. उन्हें पढकर हमेशा मन भारी हो जाता है. दुःख से जैसी दोस्ती इन कविताओं में है वैसी कही नहीं. अपर्णा ने उनकी छोटी छोटी कविताएँ इस तरह संजोयी की है प्रभाव दुःख-साज की स्वर लहरिओं की तरह सघन हो जाता है.आभार.

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  3. बहुत खुबसूरत रचना अभिवयक्ति......

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  4. एक दिन प्रेम आएगा तुम्हारे घर और घर में अन्न न होगा . एक दिन प्रेम आएगा तुम्हारे जीवन में और भर चुके होंगे सब पन्ने . एक दिन प्रेम आएगा तुम्हारे पास और तुम्हे मालूम न होगा ,प्रेम है ये .

    बदल गया होगा उसका मुख इस जन्म तक आते-आते . थक गया होगा उसका सिर. भर चुकी होगी उसमें उम्र भर की नींद .

    जाते हुए प्रेम देखेगा तुम्हें अजीब खाली आँखों से . मृत्यु के करीब सपनीली हो जायेंगी उसकी आँखें . और गीली .......
    मै गगन जी की पुरानी फैन हूँ. यही कविता पिछले बरस अपने ब्लौग पर भी लगायी थी. इतनी सारी कवितायेँ पढ़कर बहुत खुश हूँ. अपर्णा दी आप कमाल करती हैं...दिल के वीराने में फूल खिलाना कोई आसे सीखे. गगन जी को मेरा प्रेम और प्रणाम!

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  5. बेहद सुन्दर...लाजवाब अभिव्यक्ति..

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