हेमा ::



 























एक हस्ताक्षर...गूँगी दुनियाँ के उस छोर पर
 
                                                               

-१ -

चोरियों और बेईमान


नीयतों पर उठती तुम्हारी


प्रतिबद्ध, धर्मनिष्ठ, कर्मनिष्ठ


अबोध पागल तर्जनी की


आँख और अंधी किस्मत की


लकीरों को , पता ही नहीं था


किसी के काले अँधेरे सीने में


उगते फुफकारते विषदन्तों का ....


-२ -


एक स्त्री का


अपनी संवेगों से भरी


सधी रज्जु पर


सीधे तन कर खड़े होना


दंडनीय है


सधापन जाग्रत कर देता है


‘उनके’ तहखानों में


क्रूर 'गोधराई' अट्टहास ,


नहीं जानती थी ना तुम ...


उनकी प्रचंड इच्छाओं की


तनी हुई नुकीली बर्छियां


तुम्हे मारना कहाँ चाहती हैं ...


वो करती हैं छिद्रान्वेषण


कील आसनों पर


तुम्हारी देह और आत्मा का ...


नहीं ही जानती थी तुम ...


कि देवालयों में बहुत ऊँचे टाँगे गये


छिद्रित मटकों से


बूँद दर बूँद टपकता है


तुम्हारा ही तो रक्तप्राण ...


जो करता है -


और-और संपुष्ट और संवर्द्धित


उनके अनंत पुरा स्थापित


लिंग बोध के दावानल को


जाने कितनी ही योनियों तक ...


होता है रुद्राभिषेकित


हर कोने की सड़ांध पर


कुकुरमुत्तों से उग आने को


अपनी बजबजाती गलीज


रक्तबीजी पीकों से


तुम्हे सान ही डालने को ...


नहीं ही जानती थी तुम ...


कि कीचको की आधारशिलाओं पर


सर उठा इतराते है


मृत पथराये


स्वर्णिम कँवल शिखर


नहीं ही जानती थी तुम ...


कि ब्रह्न्नलाएं तो कभी की


मर चुकी है ...


-३-


काल के


उस खण्ड में


तुम्हारी आवाज की बुलंदी


एक अदद जिंदा फाँस थी


गड़ती-चुभती करक ...


उस पुरुष का अहम था


जिसे लोहे की


जंगही नुकीली सुई से


कुरेद कर निकालना ...


बेहद जरूरी था उसके लिए कि


जीवन पृष्ठ की लहर पर


तनी हुई ग्रीवा


और उठे हुए शीर्ष की


सारी मुखरताओं में ठूंस दिया जाए


कुछ बेहद जड़ ...


बेहद जरूरी था उसके लिए


मुखरताओं के खमों का


दम निकालना ...


और उनकी दुमो का


पालतू कुत्तों की तरह


उसके आगे -पीछे रिरियाना


निहायतन जरूरी था


एक पुरुषत्व के नपुंसक


सिकंदरी घाव का


भरपूर सहलाया जाना ....


-४ -


चार दशकों में बस


तीन ही बरस तो हैं कम ...


सैतीस बरसों में


कितने दिन काटे गये हैं


कोई भी गिन सकता है


वक़्त और अंतरालों की


दुनियावी घड़ियाँ


पर गणितीय मानकों के गणनांको से परे ...


लंबी बेहद लंबी


रंगहीन खनकहीन


सूनी सफ़ेद वक्तों की हैं ये


विधवा बिछावनें,


उस पर सैतीस वर्षों से पड़े


(हाँ पड़े ही तो )


उस एक निष्चेट अचल चेहरे का


अखंड पाठ


बेहद गहरा है ...


मेरा सारा पढ़ा लिखा पन


दहशतों के निवाले निगलता है


शून्यताओं के बीहड़ अनंत में


खारे समंदर की लहरें भी


सहम कर ,


हाँ सहम कर ही तो


सूखे कोने थाम कर बैठी है


उसकी आँखों के


पूर्वांचल में


सूरज को


उगने की मनाही है


उसकी पलकों की


जाग्रत नग्नता में


जबरन उतारे गये हैं


रातों के स्थाई


उतार और चढ़ाव


सवाल और जवाब भी


कोई मुद्दे है क्या -


गूँगी दुनियाँ के उस छोर पर


जहाँ हलक में


ठूँस दी गई है जंजीरें


निर्ममता की सारी सीमाओं से परे ,तोड़ कर


खींच ली गई हों


शब्दचापों की देह की


सारी साँसे ...


एक ही वार में


तहस-नहस कर


काट डाली गई हों


संवेगो की सारी जड़ें ...


जमा कर दफना दी गई हों


जैसे दक्षिणी ध्रुव के


किसी बेपनाह ठन्डे


गहरे अँधेरे टुकड़े में ...


-५-


किसी कृष्ण विवर में


सोख ली गई है


एक हरे-भरे खिले जीवन की


प्राण वायु की उदात्त ऊर्जाएँ


अंध चक्र आँधियों के भँवर ने


लील ही तो डाली है


चाँद तोडती


अपनी बाहों में तारे टाँकती


आसमान ताकती


युवा स्वप्नों की


बल खाती अमर बेल ,


एक सपाट सूने भाव शून्य


आयत पर रखी


अलटायी-पलटाई


उठाई-धरी जाती है


शय्या घावों और


देखभाल के नाम पर ...


कहते है कि


वो बस अब 'सब्जी' भर है


"सब्जी भर है" ...


वक़्त की बही के शमशान में


सत्ताओं के निर्लज्ज


अघोर अभिलेखागार में


पंजीकृत है वो


अपने एक स्त्री भर होने के


अपराध के नाम ...


-६-


क्यों जीवित है वह ...


क्या महसूस करती है वह ...


क्या है ...


जो थाम कर रखता है


सैतीस लंबे वर्षों से


उसकी साँसों की


एक-एक


कड़ी दर कड़ी ........


तो सुनो ....


सूनेपन के हाशिए पर पड़ी


अंधी और भूखी-प्यासी


जिंदगियां भी


दर्ज कराती हैं


एक ना एक दिन


अपने जमे हुए अस्तित्व के समूचे प्राण


हाँ एक दिन किसी रोज


चुपचाप उठ कर हाशिओं से


चली आती है


वक्तव्य पृष्ठों के


बिल्कुल बीचोंबीच में


और तुम्हारे बर्बर नपुंसक साम्राज्य में


जबरन अपनी उपस्थिति की जिद्द का


शाश्वत पट्टा लिखा डालती है .......

48 टिप्‍पणियां:

  1. सत्ताईस नवम्बर उन्नीस सौ तिहत्तर की एक बेहद अँधेरी रात में मुंबई के किंग एडवर्ड मेमोरियल अस्पताल में कार्यरत नर्स 'अरुणा रामचन्द्र शानबॉग' पर उसी अस्पताल के एक अस्थाई सफाई कर्मचारी 'सोहन लाल भरथिया वाल्मीकि' द्वारा हमला किया गया ....उसके मुँह में अस्पताल की प्रयोगशाला के कुत्तों को बाँधने वाली चेन ठूँस दी . अरुणा शानबॉग के साथ अप्राकृतिक दुराचार किया गया . पिछले सैतीस वर्षों से अरुणा रामचंद्र शानबॉग उसी अस्पताल के एक बिस्तर की स्थाई निवासी है ...अस्पताल के ही स्टाफ की पारिवारिक देखभाल में, लगभग मृतप्राय 'Permanent Vegitative State' में है ...
    उसका अक्षम्य अपराध एक बेईमान एवं चोर पुरुष पर आवाज और उंगली उठाना भर था ....

    यह दो लिंक हैं जो उनके बारे में पूरी जानकारी उपलब्ध कराते ... कृपया इन्हें देखने के बाद ही कवितायें पढ़े ... ये अनुरोध उस एक जीवन के पूरे त्रास में उगी हुई जिजीविषा को देख पाने के लिए भी है ...
    http://en.wikipedia.org/wiki/Aruna_Shanbaug_case
    http://www.supremecourtofindia.nic.in/outtoday/wr1152009.pdf

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  2. इस ब्लाग पर हमारे समय के सभी महत्वपूर्ण स्त्री चेहरे पढ़े जा सकते हैं ..| भिन्न परिवेशो और वातावरणों से आने के बावजूद इनमे एक चीज कामन है | और वह है इनकी छटपटाहट कि यह दुनिया कैसे न्यायपूर्ण और समान हो.| हेमा जी की कवितायेँ भी उसी दिशा की ओर जाती हुयी दिखाई देती हैं | हां ..ये स्त्रियाँ आज रिरियाहट और याचना छोड़ आयी हैं ...इनके पास वही भाषा और तेवर है , जिसे अब तक यह पुरुष वर्चस्व वाला समाज इन्हें सुनाता आया है ..| अरुणा पर लिखी हुयी कविता तो हमें झकझोर देती है ....बधाई हेमा जी को ....

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  3. उस एक निष्चेट
    अचल चेहरे का
    अखंड पाठ
    बेहद गहरा है... सब कुछ गहरा और मन को भेदने जैसा.

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  4. निष्चेट अचल चेहरे का
    अखंड पाठ
    ..........निःशब्द आंसुओं का तर्पण दिया है और कुछ नहीं मेरे पास

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  5. बेहद मार्मिक कवितायेँ हैं हेमा, उतनी ही जितना कि ये हादसा था, मैंने जब भी इसके बारे में पढ़ा कुछ भीतर तक चुभ कर वजूद को हिला देता है, ऐसा ही कवितायेँ पढने के बाद अनुभूत हुआ.....बधाई तो नहीं कहूँगी हाँ शुभकामनायें यूँ ही मन को छूती रहो हेमा........

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  6. heनिर्ममता की सारी सीमाओं से परे ,तोड़ कर

    खींच ली गई हों

    शब्दचापों की देह की

    सारी साँसे ...

    एक ही वार में

    तहस-नहस कर

    काट डाली गई हों

    संवेगो की सारी जड़ें ...

    जमा कर दफना दी गई हों

    जैसे दक्षिणी ध्रुव के

    किसी बेपनाह ठन्डे

    गहरे अँधेरे टुकड़े में ........हेमा ...कुछ कहूँगी तो इन्ही कवितओं के बीच की पंक्ति होगी ...तुम्हारे शब्दों के भावों को भोगा है हमने ...

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  7. यह काव्‍य-श्रृंखला अरुणा शानबाग के साथ घटे बर्बर हादसे और उससे उपजी आसन्‍न पीड़ा को विकल स्‍वर में व्‍यक्‍त करती है, एक हाहाकार-सा सुनाई देता है, इस लंबे काल-खंड की पीड़ा में और इसके लिए उस घृणित जानवर को दी गई कोई भी सजा अपर्याप्‍त ही लगती है, उसे तो ऐसी सजा दी जानी चाहिये थी कि वह मौत मांगे वह भी उसे आसानी से मिले नहीं। लेकिन यह हादसा मानवीय चिकित्‍सा प्रणाली और लोकतांत्रिक न्‍याय-व्‍यवस्‍था के सामने भी एक गंभीर चुनौती है कि वे भी इसका कोई संतोषजनक हल नहीं ढूंढ पाए। अरुणा शानबाग के साथ घटा यह दर्दनाक हादसा पिछले बरसों में बराबर हमें विचलित करता रहा है, और जब भी इस पर ध्‍यान जाता है, मन गहरे अवसाद से भर जाता है। हेमा ने इसे कविता का विषय बनाया, मैं समझ सकता हूं, कितनी दारुण यातना के बीच से गुजर कर ये शब्‍द आकार ले पाए होंगे। काश, ऐसी कविताएं ही कोई सुकून दे पाती।

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  8. मैं हेमा की पीठ ठोकना चाहता हूं, बस ! एक सुपरिचित घटना और उससे उत्पन्न मुसलसल यातना को कविता में ढाल पाना आसान काम नहीं होता. हेमा ने ग़ज़ब किया है. बहुत बधाई, हेमा.

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  9. मैं हेमा की पीठ ठोकना चाहता हूं, बस ! एक सुपरिचित घटना और उससे उत्पन्न मुसलसल यातना को कविता में ढाल पाना आसान काम नहीं होता. हेमा ने ग़ज़ब किया है. बहुत बधाई, हेमा

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  10. aruna shauhbhag hamare sabhya samaj ke muh par jada gya ek lachari ka tamacha hai.. shayad hee is poori dharti par ek bhi maanv aisa hoga jo aruna ki sthiti se drvit na ho.. lekin us nyaay vyvstha ka kya kijiyega jo forced anal sex ko rape nhi maanta.. aise ghinone kanoono ko badlne kee zaroorat hai.. hema aapki kvitayen sundar hain..

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  11. एक स्त्री का
    अपनी संवेगों से भरी
    सधी रज्जु पर
    सीधे तन कर खड़े होना
    दंडनीय है.

    कई बार सोचता हूँ आख़िरकार यह सभ्यता स्त्रीत्व से डरती क्यों हैं. उसे बलात अनुकूलित करने का ही क्या नाम संस्कृति है. आखिकार सभी धर्म यही तो करते हैं. यह आवाज़ और बुलंद हो.

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  12. कुछ समय पहले मैंने ऐसा कुछ हेमा से कहा था कि लंबी कविता की तैयारी करो और हेमा ने कर दिखाया। एक अच्छी कविता। हेमा बहुत बधाई। मैं बहुत खुश हूँ। श्रोत्रिय जी और नंद जी को हौसलाअफजाई के लिए मैं अपनी ओर से भी धन्यवाद देता हूँ। कविता की लंबी उड़ान पर निकल चुकी हेमा से काफी उम्मीद है। ऐसे ही लिखती रहो। बस।

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  13. एक स्त्री का
    अपनी संवेगों से भरी
    सधी रज्जु पर
    सीधे तन कर खड़े होना
    दंडनीय है...

    बेहतर हस्तक्षेप...

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  14. यह पर्टिकुलर मामला सिर्फ संवेदना के सवाल से नहीं जुडा... मौजूदा सिस्टम के रुख ने एक बहस भी छेड़ा है इसके ऊपर.. क्या तय विधियों के अभाव में पल्ला झाड लेने की नियति मानव प्रतिष्ठा के दृष्टिकोण से अनुचित नहीं है ...इसी से जुडा सवाल इच्छा मृत्यु को वैधानिक ढाँचे दिए जाने के जवाब से भी बावस्ता है .. तारीफ़ करूँगा आपकी कि आपने अपनी रचनात्मकता में अपने बौद्धिक सरोकार को यूँ जोड़ के फिर से एक संवाद की गुंजाइश पैदा की .. '' वक़्त की बही के शमशान में

    सत्ताओं के निर्लज्ज

    अघोर अभिलेखागार में

    पंजीकृत है वो

    अपने एक स्त्री भर होने के

    अपराध के नाम ... ...'' अह....क्या कहा जाए... आपका संवाद कालक्रम में अंजाम तक पहुंचे..

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  15. बहुत अच्छी कविता. बधाई हेमा जी!!

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  16. मार्मिक कविता.. हेमा जी को बधाई और शुक्रिया अपर्णा..

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    1. निश्चित रूप से हेमा की कविता की इस सिरीज़ ने पाठकों का मन उद्वेलित किया है . झिंझोड़ा है . हेमा की कविताएँ अकसर पढ़ रहे थे . लगातार उनकी कविताओं में नयापन दिखाई देता . उनके भीतर के कवि में अकुलाहट है जो प्रभावित करती है . आपके मन में चिंता पैदा करती है ..उस चिंता के लिए जागरूक बनाती है ..
      शुभकामनाएँ हेमा फूलों की तरफ से .

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  17. किसी भी संवेदनशील इन्‍सान के मर्म को झिंझोड़ने को काफी है यह कविता...इस जघन्‍य कांड से उठे सवाल आज भी जवाब मांगते हैं, हमें इनसान कहे जाने पर सवाल खड़ा है और अरुणा शानबाग उस सीमा पर है जहां जीवन अपने अर्थ खो चुका होता है लेकिन कितना विचित्र है कि इस जीवन का अब एक खास अर्थ है ...वह है हमारी इन्‍सानियत के लबादे को लगातार चुनौती देना....हेमा दीक्षित ने उस आवाज को अपना बनाया है जिसे सुने जाने का इंतजार तकरीबन चार दशकों से है....बेहद मार्मिक रचना...

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  18. KY AKAHUN SHABD HI NAHI NA KAVITA KE LIYE NA HADSE KE LIYE

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  19. हॉं, यह प्रसंग बहुत कारुणिक है। लोगों ने जो प्रतिक्रियाऍं दी हैं, उन्‍हीं में मेरा समव्‍यथी स्‍वर भी शामिल है। पूरी कविता श्रृंखला से गुज़रना एक यातना से गुज़रना है।

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  20. yeh kavitayen sanvedna parak hone ke saath saath aapne nitaant sahej aur marmik bhaav bodh ke kaaran aasani se man me utar jaati hain. Hema ke kavi sansaar ka yeh vistaar swagat yogya hai

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  21. अंतरात्मा तक झिंझोड़कर रख दिया आपकी कविताओं ने !!!वो हादसा जितना दर्दनाक शर्मनाक था उसकी अनुभूति आपकी पंक्तियों से उजागर हुयी है साधुवाद है आपको हेमा जी !!

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    1. सच्ची रचना वही है जो किसी की पीडा को वाणी दे. झ्क्झोर दे. समाज के लिये सर्थक हो. मन प्राण को झक्झोर देने वाली रचना के लिये हेमा जी को सधुवाद!

      हटाएं
  22. उसकी आँखों के
    पूर्वांचल में
    सूरज को
    उगने की मनाही है

    क्या कहूँ .....निःशब्द हूँ ....हेमा जी को कोटिशः आभार और साधुवाद
    सुशील

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  23. शरीर में सिहरन उठाती है ये कविता. अरुणा के बारे में पहले पढ़ा था, आज महसूस किया.

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  24. एक एक शब्द शूल सा..
    निशब्द हूँ...

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  25. andar tak jhakjorane ki takat rakhati hain hema ji ki kavitayen.

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  26. इतनी संवेदना पूर्ण तथा मार्मिक हैं कवितायेँ की कुछ भी कहना उचित नहीं लग रहा.संवेदन हीन हो रहे समाज मे ऐसी घटनाएँ लगातार बढ़ रही हैं.ऐसी सार्थक आवाजों के सुर मे सुर मिलाने की ज़रूरत बढती ही जा रही है

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  27. आर्थिक असमानता,जातीय असमानता, लैंगिक असमानता आदि असमानताओं में आर्थिक असमानता प्रमुख है ! यही सारे दोषों की जड़ है ,हर तरह के पतन के लिए जिम्मेदार है ! कविता में स्त्री मन की पीड़ा को बहुत सशक्त रूप से व्यक्त किया है आपने ! कविता पोरा असर छोड़ती है ,लेकिन यह असर भी कहाँ तक जाएगा ? जिनकी संवेदना पहले से ही मर चुकी है, उनका कोई इलाज नहीं !
    कविता के लिए बधाई !

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  28. ऐसे मार्मिक और बेहद संवेदनशील प्रसंगों पर कविता जैसा कुछ भी लिखना मुझे तो भयाक्रांत करता है... कुछ यातनांए ऐसी होती हैं, जिन्‍हें शब्‍द बयान नहीं कर सकते... और करे तो अक्‍सर कम ही पड़ते हैं...इसीलिये इतनी भाषाओं में इतनी 'रामायण' लिखी गईं...इस कविता पर कुछ भी कहना खतरनाक है... यातना और संत्रास कविता से अधिक काफ्का के 'ट्रायल' में महसूस होते हैं... 'बक रहा हूं जुनूं में क्‍या-क्‍या, कुछ न समझे खुदा करे कोई...'

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  29. हमारा समाज कई तरह की असमानताओं से घिरा है ,आर्थिक,जातीय,लैंगिक,वर्ण आदि आदि ! इन सबमें सबसे प्रमुख आर्थिक असमानता है ! यही सारे दोषों ,अपराधों की जड़ है ! सारी असंवेदनशीलता ,हृदयहीनता,नैतिक पाटन के लिए जिम्मेदार है यह !
    कविता आपकी बहुत सशक्त है और अपनी बात असरदार तरीके से व्यक्त करती है ,लेकिन यह असर कहाँ तक जाएगा ? जिनकी संवेदनायें मर चुकी हैं उनका कोई इलाज नहीं !

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  30. आपकी रचना के भावों को पढ़ते पढ़ते जैसे जड़ हो गयी .... हर शब्द में छटपटाहट है इस समाज के प्रति ,नारी की विवशता का लाभ लेने वाले नपुंसकों के प्रति आक्रोश है .... बहुत मार्मिक और संवेदनशील प्रस्तुति

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  31. न्याय की कब्रगाह पर मनुष्यता की अस्थियाँ तलाशती कविता. आत्ममुग्ध आक्रोश और भावुक ग्लानियों के आत्मघाती घोंसलों को तिनका-तिनका बिखेरती. सवाल पूछती, आरोप तय करती, हम सब के हिस्से का विलाप करती और हमारे आततायी मौन को एक प्रतिबद्ध क्रोध में तब्दील करती. ......... श्रीकांत याद आ रहे हैं- मित्रों / यह कहना कोई अर्थ नहीं रखता/ कि मैं घर आ पहुंचा / सवाल यह है की इसके बाद कहाँ जाओगे?
    बधाई नहीं, सिर्फ आवाहन.....

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  32. उस एक निष्चेट अचल चेहरे का

    अखंड पाठ

    बेहद गहरा है ...

    मेरा सारा पढ़ा लिखा पन

    दहशतों के निवाले निगलता है ..........दुखद ,त्रासद ,मार्मिक ......इस कविता को पढ़कर बहार निकलतें हैं आप ....और यूँ लगता है कहीं से पिट कर आयें हैं ........|

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  33. आक्रोश अपने सम्पूर्ण संवेदना से मुखरीत हुआ है

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  34. किसी ऐसी घटना को कविता में तब्दील करना जो इतनी चर्चित रही हो ..........यह मुश्किल होता है .........मगर हेमा जी ने इसे संभव किया ......और वह भी खास अंदाज़ में .........मुझे यकीन है कि अरुणा कि आप-बीती तक हेमा जी को उनके भीतर का कानूनविद ले गया होगा ......मगर फिर उनके भीतर के कवि ने अरुणा शानबाग केस को वह पहलू देखा जो कोई अदालत शायद ही देख पाती है......अरुणा के बहाने हेमा जी ने स्त्री की हमारे समाज में स्थिति पर सार्थक टिपण्णी की है| वे बधाई की पात्र हैं और अपर्णा जी भी |

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  35. बहुत सशक्त कविता हेमा जी.. पूरा-पूरा समझने में थोडा वक़्त लगा. आपने जिस मानसिक स्थिति में इसे लिखा होगा उसी मानसिक स्थिति मे पाठकों को ले जाने में सक्षम हैं आपके शब्द.

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  36. हेमा जी.....बहुत ही दारुन स्थिति है. यही आकर सारी सभ्यताओं की हवा निकल जाती है.......दंभ तो ऐसे भरती हैं ये सभ्यताएं जैसे यही हैं परिपक्व. देश की मूल. ऐसा मूल नहीं चाहिए......जो धरती की धुरी को डिगा दे.
    -------------विपुल जी का आभार ! इस हक्कीकत से दो-चार कराने के लिए--------

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  37. baap re itne kathor shabd....
    lagta hai dhundh dhundh kar shabdo ko been kar sajaya hai... apne akrosh ko deekhane ke liye....!

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  38. आपकी ये कवितायेँ पढ़कर अहसास हुआ कि कविकर्म में दुरुह्तर संवेदनायों की वैतरणी पार करके ही अपने पाठकों से समाज का दर्द साँझा किया जा सकता है .हेमा जी, इन कवितायों में दर्द की जो अनुभूति है वह किसी भी संवेदनशील व्यक्ति को हमारी अराजक व्यवस्था एवं क्षीण होती मानवीय संवेदनायों के प्रति आगाह करने में सक्षम है .आपने अरुणा शानबाग की पीड़ा को वाणी देकर वर्तमान व्यवस्था के सामने भी एक बहुत बड़ा प्रश्न तो खड़ा किया ही है साथ ही मौन साधे बैठे हमारे लेखकों /वुद्धिजीवियों के समक्ष विचारने का सूत्र भी दिया है .इस भयंकर समय में जब आदमी (औरत शायद ज्यादा सार्थक हो)
    के लिए जीने की सामान्य स्थितियां भी न बची हुयी हों तो कला को/ कलम को व्यसन की बजाय हथियार में बदल जाना चाहिए .आपने इस दायित्व को बखूबी निभाकर लेखकों के सामने कुछ कर सकने की गुंजायश पैदा कर दी है .यक़ीनन आपने कलम की सार्थकता साबित कर दी है .अरुणा शानबाग की जिजीविषा को सलाम.

    -परमानन्द शाष्त्री

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  39. पढ़ती रही मै......इन कविताओं को.....
    कई बार,बार-बार....
    स्तंभित सी......,आह़त, कभी छुब्द्ध .......
    प्रतिक्रियाएं....आती रहीं,अनेकों,पर व्यक्त नहीं हो पा रहीं........
    अब तक.....नहीं हो पा रही ........
    .....................................
    एक घृणित दौर में जीवित रह कर सब कुछ मूक देखते रहने की निस्तब्द्ध्ता है ये....
    हमारे सामूहिक शर्म का विषय...!!

    -सुमन सिंह

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  40. हम कोई प्रतिक्रिया देने की भी हालत में नहीं रह गए हैं....झिंझोड़ के रख दिया....दिमाग सुन्न हो गया है...
    -अनीता सिंह

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  41. हेमा दीक्षित (Hema Dixit) से कभी नहीं मिला पर उनकी कविताओं से अक्सर मुलाक़ात होती रही है. पिछले एक-डेढ़ साल से यह मुलाक़ात जारी है. यह मुलाक़ात ऐसी मुलाक़ात नहीं है, जहाँ आदमी 'हाय और बाय' कहते हुए जल्दी से पतली गली से निकल जाना चाहता हो. यह मुल
    ाक़ात ठहराती रही है, मन को भी और लेखनी को भी. इसलिए चाहते हुए भी उनकी कविताओँ पर अब तक कुछ लिख नहीं सका. चाहना हमेशा जल्दी से कब पूरा हुआ है. लिखे तो कोई तब ना जब इस मुलाक़ात के बाद मन की बेचैनी कुछ कम हो. चाहे अरुणा शानबाग पर लिखी उनकी मार्मिक और बेजोड़ कविता हो या जीवन के हर पल में दर्द सहती किसी भी औरत के ऊपर. अस्पताल में बैठकर आने-जाने वाली औरतों की बात हो या किचन में काम करने वाली किसी महिला की बात, हेमा की कविताएँ वहाँ पहुँचती हैं और पाठकों को भी पहुँचाती हैं. कुछ लोग शायद उन्हें नारीवादी और स्त्री-विमर्श की कवियित्री स्वीकार करें, पर मेरे लिए वे केवल संवेदना की कवियित्री हैं, मानवीय संवेदना से भरपूर, मानवीय संवेदना से ओत-प्रोत. अधिक नहीं लिखूँगा. आप उनकी कविताओं को यहाँ पढ़ सकते हैं और उनकी कविता पर विद्वानों की राय भी. मुझे तो उनको शुभकामनाएँ भर देनी हैं, बस.

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