तबस्सुम फ़ातिमा::

तबस्सुम फातिमा
जन्म : 3 जुलाइ 1972
किताबें :   लेकिन जज़ीरा नहीं (कथा-संग्रह)
          तारों की आखिरी मंजिल (कथा-संग्रह)
          जुर्म  (उपन्यास)
          उर्दू की श्रेष्ठ कहानियां (संपादन)
संप्रीत :     मीडिया के लिए फ्रीलांसिंग। 50 से अधिक वृत्तचित्र का निमार्ण. साहित्य और दूसरे विषयों पर धारावाहिकों का निमार्ण.

इधर कविताएँ भी लिख रही हैं. परिकथा,हंस पत्रिकाओं में प्रकाशित .
पता : डी-304 ताज एन्कलेव गीता कालोनी दिल्ली 110031
मोब : 9958583881



tabassumfatima2020@gmail.com
 

तबस्सुम फातिमा का मूल स्वर कथा और कहानी है. इधर उनकी कविताओं ने ध्यान खींचा है.स्त्री संसार की चिंता यहाँ दिखाई देती है.





सीपियाँ ::
 
मैं हंसने के लिए रोर्इ
आसमान पर रूर्इ के बादल चलते थे
तारों की रातों में चांद तैरता था
लहरों के सपनों में कश्ती हल्कोरे लेती थी
खेतों की फसलों में इच्छायें बहती थीं

मैंने हाथ फैलाये
तो तारों की रातें खाली थीं

दृष्टि उठार्इ
तो रूर्इ की जगह लाशों को कंधे देते बादल के टुकड़े थे
लहरों की ओर देखा
तो कश्ती के बादबान टूट चुके थे

किसानों की आत्महत्या के समाचार मिलने तक
खेत, होते हुए भी पहुंच से दूर थे

मैं हंसने के लिए रोर्इ
या रोने के लिए हंसी
कि भावनाओं पर
पहले से ही धुंध ने अपनी जगह बना ली थी।
 


(2)

मैं दुख जाती हूं
हर बार जीवन को समझने
और सपनों में पतझड़ चुनती हुर्इ
दुख जाती हूं मैं

हर बार रिश्तों को बिखरता देख कर
सीपियों में बंद गहरे एकांत का अनुभव करते हुए
दुख जाती हूं मैं

बचपन में बनाये नन्हे मुन्हे घरोंदे
और उनके तोड़े जाने की व्यथा को
आज के समय से जोड़ती हुर्इ
जब स्वयं को

अक्वेरियम के बासी पानी में
रखी मृत मछली की तरह पाती हूं
दुख जाती हूं मैं

                      


(3)

मैं शर्मिंदा हुर्इ......
मैं रोने से पहले शर्मिंदा हुर्इ
कि आंसुओं के हज़ार रास्ते
दूसरे दरवाज़ों से भी हो कर जाते थे

मैं हंसने से पहले शर्मिंदा हुर्इ
कि दर्द की ओर जाने वाले रास्तों की
हज़ार शाखें बन चुकी थीं।

मैं र्इमान लाने से पहले शर्मिंदा हुर्इ
कि मैं र्इश्वर को अपने जूड़े में टांकते हुए
बहुतों से अलग कर रही थी

मैं प्यार करने से पहले शर्मिंदा हुर्इ
कि अपने लिए एक अधिकार को मांग कर
प्यार के हज़ारों अधिकारों को असहज कर रही थी

ज़ीने की हर सीढ़ी पर

शर्मिंदगी के फूल पड़े थे
इन्हें चुनते हुए ही
मुझे जीना सीखना था
अपने लिए

(4)

रोना... एक रहगुज़र
मां बताती थी,
पैदा होते ही इतना रोर्इ थी
कि आसमान नीला पड़ गया

मेरी आमद से चहकने वाले चेहरे
खिज़ाओं का हिसाब लगाते हुए
बारामदे में अमरूद से गिरने वाले सूखे
पत्तो को देख रहे थे।

तब की बात है



होली के बहाने
नज़ीर अकबर आबादी को याद करते हुए

                                 

(1)
नज़ीर की होली

कल्पना कर सकती हूं
कि अकबराबाद के गली-कूचों में
नंगे पांव, यायावरों की तरह घूमते हुए
रंग और गुलाल से खेलते हुए
आबाद कर लेते होगे
तुम-नज़ीर
अपने लिए एक नयी दुनिया
होली है के शोर में
तुम्हें अपनी भी फिक्र कहां रहती होगी नजीर

मुहब्बत का एक  ही होता है रिश्ता,
एक ही होती है तकदीर
अकबराबाद की गलियों में तुम
उड़ाते होगे- गुलाल और अबीर
फिर से खींच दो ऐसी एक लकीर
जहां कोर्इ भेद न हो नजीर

                           
(2)
नज़ीर
होली में तुम हुड़दंग करते थे
और इस हुड़दंग में प्रेम होता था
अकबराबाद की गलियां
तब वीरानियों के नौहे कहां लिखती थीं
रंग भरी पिचकारियां
तब राजनीति और धर्म कहां देखती थीं

नज़ीर,
समय के सफेद पन्ने
अमन का प्रतीक कहे जाने वाले
कबूतरों के सुर्ख रंग से भीगे हुए हैं
ऊपर स्याह आसमान है
उड़ती
हैं अबाबीलें
पिचकारियों से रंग गायब
मंदिरों से भक्ति 

और
मस्जिदों से अजान गायब
धर्म की पनाहगाहों से इंसाब गायब
होली ने नये इतिहास का कवच पहन लिया है
विभाजन से अब तक की त्रासदी में
रंगों की होली,
मुहब्बत के किले को तकसीम करती हुर्इ
खून की होली में परिवर्तित हो गर्इ है

आओ कबीर
चले आओ मीर
होली को फिर से उसके पुराने रंगों वाला नाम
लौटाने की जरूरत है नजीर
(3)
नज़ीर
तुम्हारी शान ही और थी,
बसंत आता तो बसंती बन जाते तुम
दसहरा में भी नंगे पांव
विजय-पर्व के रथ को थाम लेते तुम
दीपावली में
जश्ने-चिरागां के संगीत को आवाज देते
और होली में
रंगों से सराबोर हो कर
तुम हमेशा रचते थे
समय के पन्ने पर एक ऐसी कविता
जहां दानिश्वरी से पहले प्रेम होता था
झरने से पहले संगीत होता था
जीने से पहले जीने की चाह होती थी
धर्म से पहले होती थी इंसानियत
जैसे फूल से पहले होती थी खुश्बू

नज़ीर
अकबराबाद की गलियों से
रंगों की पिचकारियां ले कर आओ
फिर लिखो
जीवन के नये अध्याय की नयी कविता
बुरा न मानो होली है
रंगों की टोली है
हवा में है अबीर और गुलाल की महक
पर्व-त्योहारों को धर्म से जोड़ने वाली जनता
सचमुच भोली है




मलाला के लिए कुछ कविताएं
               
     
  


(1)
मलाला,
प्यारी मलाला,
यहां सब कुछ अविश्वसनीय है तुम्हारी तरह
कहूं। कि तुम्हारे सपने आते हैं
तो सहसा तुम विश्वास नहीं करोगी
कहूं। कि एक युवा बेटे की मां होते हुए भी
इन दिनों परियों की दुनिया में होती हूं
तो शायद मेरी ओर तुम आश्चर्य से देखो

मलाला, प्यारी मलाला,
लेकिन मुझे।
ऐसे सुखद और लगातार आने वाले सपनों पर
कोर्इ मलाल नहीं है

जैसे जादुर्इ कथाओं में
एक शहजादी देव को मार गिराती थी
या एक नन्हीं मुन्नी राजकुमारी
मुँह से शोले उगलते राक्षस का वध कर डालती थी

मलाला, प्यारी मलाला
तुम तो इन शहजादियों और राजकुमारियों से भी
कमसिन हो
खूंखार तालिबानियों के गढ़ में तुम्हारी मौजूदगी
अब भी मेरे लिए किसी परि-कथा जैसी है
अविश्वास के चंद्रमा को
कभी इससे पहले इतना चमकीला नहीं देखा था मैंने


(2)

मलाला
जाने मलाला,
तुम्हें गुले मकर्इ कहूं या किस नाम से पुकारूं
मलाल से जन्मी तुम
आज के परिदृश्य में
केवल एक फूल का प्रतीक हो
इस असभ्य दुनिया में
तेजी से
जिसकी खुश्बू को फैलते देख रही हूं
मैं

(3)

मलाला,
मेरी प्यारी मलाला,
सोचती हूं तो आश्चर्य होता है
शलवार और क़मीज़ में
एक प्यारी सी चुनरी से मुँह ढके
स्कूली बस्ते को कंधे से लगाये
जब आखिरी बार
पलट कर देखा होगा तुमने अपने स्कूल को

देखा होगा
घनी दाढि़यों वाले हाथों को आर डी एक्स
और विषैले हथियारों से खेलते

सुने होंगे,
कान की परतें फाड़ने वाले खौफनाक धमाके

और कैसे मासूम सी तुम
घर आ कर बन गर्इ होगी।
मलाला से गुले मकर्इ

उस एक परिंदे के किस्से में
जो आग से जलकर एक नये शरीर को पा लेती थी

बंदूक से निकली
बेरहम गोली के ताप को ले कर
मलाला,
प्यारी मलाला,
तुम भी एक नये शरीर में दाखिल हो गर्इ हो

सूर्योदय के समय, 

दृष्टि असभ्य और आतंक से लरज़ती दुनिया में
तुम्हारी नन्हीं सी और मासूम सी उम्र की कसम

मलाला
प्यारी मलाला
अपनी बेरहम दुनिया की
तुम्हारे भीतर
एक बदलती हुर्इ तकदीर देख ली है मैंने।



                      



13 टिप्‍पणियां:

  1. apka shukriya ki apne apne blog mein jagah di .mujhe hindi mein type karne nahi aata .seekh lungi ..is baat ki khushi hai .ki apko meri kavitayen pasand aayin ...mujhe jeena pasand hai .chahakna pasand hai ..samwad pasand hai ..aur zindagi mein shikast kabhi manzur nahi rahi ...isliye zindagi ko jeena jaanti hun ...aur jeene ke liye kavita har mod par ..har morche par mera sath deti hai ...main kah sakti hun , jeewan ko apni aankhon mein dekha , jahan us antar ko samajh nahi payi jo samaj ne mard aur aurat ke beech kiya tha .aaj tak nahi samajh paayi ..isliye kavitaon meinjeete hue istree to rehti hai mere bheetar ...lekin use VIMARSH bana kar kamzor nahi karti .purush vimarsh kyon nahi ? jeena mere liye nazeer ki holi hai ..to ghalib ka aahang .kabir ki vani hai ,to nirala ki graj bhi ..main seemaaon se pare hun ..khwab dekhti hun ...aur ...har baar zindagi ko samajhne ke liye urna chahti hun ..kisi pakchhi ki trah..khule aasmaan mein ...

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  2. सभी कविताएँ एक से बढ़कर एक. पहली बार उनकी कविताओं से रूबरू हुआ. उनकी कहानियों का समर्थ रचनाकार कविता में भी उतरता दिखता है. आशा है वे बहुत जल्द कविता के क्षेत्र में भी अपनी एक अलग पहचान बना लेंगी. बहुत बहुत शुक्रिया अपर्णा दी उनकी कविताएँ पढ़वाने के लिए.

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  3. चश्मा लगा के कविता तो पढ़ लिया मगर कमेन्ट तो चश्मे के बावजूद भी नहीं दिख रहे ..... तबस्सुम जी बधाई की हकदार हैं सभी कवितायें सुंदर !

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  4. पैदा होते ही इतना रोर्इ थी
    कि आसमान नीला पड़ गया....Malaala ki kavitao ne bhavook kar diya ,...bahut bhavnatmak lay mai likhi hui hai sari kavitaye,....badhai

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  5. तबस्सुम फातिमा जी की कविताओं में मध्यवर्गीय बेचैनी खासी प्रखरता से अभिव्यक्त हुई है और साथ ही उसे जैसे संतुलित करती कोमलता और सहज मानवीय गरमाई भी इन कविताओं में प्रकट है । मौजूदा समय की निर्मम प्रखरता और विविधतापूर्ण जटिलता को मार्मिकता में उजागर करने की उनकी सामर्थ्य सचमुच चकित करती है और प्रभावित भी |

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  6. sayeed ayub ji ,anand kumar dwivedi ji,pravesh soni,mukesh mishra ji...ap logon ke sunder shabd aankhen nam kar gaye .kavita mere liye jeene ka hi ek madhyam hai---ek aisi apni duniya ..jahan abhi vyakti bhi hai ...sare zamane ka dukh-sukh orh lene ki ichha bhi ..aaj ke samaajik -rajnitik pradrishya ke baare mein sochti hun ...to bhavishya kisi drawne sapne ki trah lagta hai ...phir shabd ..kavita bante chale jaate hain ....apki hausla afzayi ke liye mere pas shabd nahi ..aparna ji ka shukriya ki unhone ap logon se qurbat ka awsar diya ......

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  7. मंगलवार 16/04/2012को आपकी यह बेहतरीन पोस्ट http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर लिंक की जा रही हैं ....
    आपके सुझावों का स्वागत है ....
    धन्यवाद .... !!

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  8. बेहद खूबसूरत रचनाएं....
    अभिभूत हूँ पढ़ कर..

    आभार
    अनु

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  9. बेहद खूबसूरत रचनाएं.....तबस्सुम फातिमा जी की

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