वंदना शुक्ला ::




























सूर्योदय::

कल रात थी हर रात –सी
बोझिल उबाऊ सुनसान,
काले बादलों से भरी
पूरी रात बरसती रही उदासी
ठंडी बूंदों में ठिठुरती,
मौन सन्नाटों के साथ
पर सुबह,
पूरब में खिला है इन्द्रधनुष
आसमान है गीला ,पर साफ़
रात की बारिश ने धो दिए हैं
पुराने अर्थ कुछ नए शब्दों के
शायद .... 





रोशनी::

आज दिखा सुबह का तारा ,अरसे बाद
खिडकी से ....
जब रख रही थी मैं
तह करके उम्र को जिंदगी के बक्से में
हर रोज की तरह!
कोई आहट सी हुई थी उदासी की देहरी पे
लगा ,करवट ली होगी किसी सपने ने
नीद में कुनमुनाते हुए
यकायक ,खिलखिला पडी उम्मीदें
ज्यों झनझनाती हैं उँगलियाँ
सितार के तारों पर,
ज्यों फूटती हैं रागिनियाँ
किसी बांस के झुरमुट से
होता है ऐसा ,पर अक्सर नहीं
कि परिधि छोटी पड़ जाती हो धरती की
बिखरे सपने समेटने को
तब आंख से किसी बुझी उम्मीद का काजल ले ,
लगा देती हूँ वक़्त के माथे पर मै !





सहेज::

प्यार
एक दस्तक,
जिंदगी की देहरी पर
सुनना होता है जिसे बहुत एहतियात से
किसी तितली के पंखों की
सुरसुराहट की तरह
स्पर्श करना होता है
गुलाब की पंखडियों सी नरम छुअन से
इच्छाओं के कोमल अहसास में सिमटी
ओस की बूंद –सा ,
हवा में तैरती किसी
सूफी गायक की खनकदार आवाज़ सा
प्यार-
पढ़ा जाता है जिसे
आत्मा की आँखों से और
लिखा जाता है ,आँखों की दवात में घुली
रात की स्याही से
नाज़ुक सफेद-लाल रुयेदार पंख है ये
हथेली पे ढकना होता है जिसे दुसरी हथेली को ,
हवा की मनमानी से हिफाज़त के लिए



रिश्ते::

रिश्ते ,जो टूट जाते हैं,
कहानी हो जाते हैं ..!.कहानी में अब भी
हाथों की ऊष्मा को लहरों की नरमी से महसूसते
बैठे रहते हैं नदी के तट पर मौन मुग्ध ,कभी
हाथ थामे घूमते हैं ,दूर तलक
अहसासों की लंबी सड़क पर ...
चेहरों पर खेलती है घने वृक्षों की पत्तेदार छाया
शायद ठहर गए होते हैं कदम
और चल पड़ती हैं रूहें ..रास्तों के संग
,बतियाती-लहराती ,
हमसे आगे निकलने की होड में
हर मोड पर छिप छिप से जाते !
मोड आने से पहले रास्तों की खिलखिलाहट
गूंजने लगती दिशाओं में ,
हम भी हंस देते उनके साथ
हर मोड हमेशा हंसेगा नहीं ये जानती हूँ मैं
खुलेगा किसी बिंदु पर जहाँ ,
अलग होते रास्तों के कदम ,पीठ कर चल पड़ेंगे
अपनी अपनी दिशाओं में ,
बिखरना अच्छा नहीं होता ,
कहानी का हो या फिर रिश्तों का !
क्यूँ कि कहानी का बिखरना
जिंदगी का बिखरना ही तो है
लिहाजा,हिस्सों से बेहतर है बगैर किसी उपसंहार के
लौट आना वापस किसी कहानी का
बीते हुए रास्तों पर ...
नई शुरुआत के लिए...



बिम्ब::

 
सूरज अपने लाल पीले अंग वस्त्र पहन
उतर रहा हैं हौले हौले सीढ़ियों से क्षितिज की !
सीढियां ,जो उतर रही हैं सिलेटी धुंधले से
समंदर के भीतर ...समंदर जो फैला है
ठीक मेरे सामने .. ...
रात की सुर्ख सतह ,आइना हो गई है
कर रही हैं श्रृंगार चांदनी जिसमें
उतर रहे हैं बिम्ब समंदर की आँखों में
बगल गीर इमारतों और बत्तियों के
ऊपर साफ़ नीला विराट आसमान
नीचे अतल गहरा मीलों फैला अनंत समुद्र
डिब्बों सी अधर में लटकी इमारतें
जैसे बैराग और विस्तार की दो हथेलियों के बीच
एक कुलबुलाती सी आस्था !


5 टिप्‍पणियां:

  1. सुन्दर भावभरी अभिव्यक्ति .कहते रहिये .

    उत्तर देंहटाएं
  2. सुमन केशरी30 जून 2011 को 12:47 am

    प्यार
    एक दस्तक,
    जिंदगी की देहरी पर
    सुनना होता है जिसे बहुत एहतियात से
    किसी तितली के पंखों की
    सुरसुराहट की तरह
    स्पर्श करना होता है
    गुलाब की पंखडियों सी नरम छुअन से... सुंदर भाव को सटीक शब्दों में व्यक्त करने के लिए बधाई... पनघट का रास्ता आसान नहीं...इक आग का दरिया है और डूब के जाना है...

    उत्तर देंहटाएं
  3. सभी रचनाएं एक से बढकर एक। शुभकामनाएं

    उत्तर देंहटाएं
  4. roshni aur khidki --abhi do hi kavitayen padhi hai...bahut pasand aayi

    उत्तर देंहटाएं