संध्या नवोदिता ::





                       
  




















                      
हज़ारों खुशबुओं पर::
फिर से आए हैं फूल

रात की रानी पर

या कि तमाम इच्छाएँ खिली हैं यहाँ

आँखों के चमकते जुगनू

रोशन हैं इन फूलों में

दुनिया की हज़ारों ख़ुशबुओं पर

भारी है

महक रात-रानी की


ब्रह्माण्ड की यात्रा पर::

कल मैं जन्म लूँगी

नाम रखा जायेगा मेरा

बढूँगी सुबह की किरणों की मानिंद

और रात होते-होते चाँदनी में बदल जाऊँगी

कल जब मैं आँखें खोलूँ

तुम मुझे सपने देना माँ

मैं हँसूं तो दिखाना अँधेरा

और रोऊँ तो खुशबुओं की डोर मेरे हाथ में देना

फिर नन्हीं-नन्हीं खुशियों को समेटेंगे हम मिल कर

और दुनिया की उँगली पकड़ निकल जाएँगे

ब्रह्माण्ड की यात्रा पर


मेरे लिये::

जिस दुनिया में

संतृप्त

ऊबे हुए मेरे साथी पुरुष

अब कुछ बचा ही नहीं

तुम्हारे लिए

जहाँ

जिस दुनिया में

चीज़ें शुरू होती हैं

वहीं से

मेरे लिये



स्त्री::

जल तरंग-सा बजता रहा दुख

स्त्री ने

पीड़ा को सहेजा था

दर्द को समेटा था

इसलिए

खुशियाँ गुज़र गयीं

किनारे हो कर

आँखें नहीं रहीं

कभी आँसुओं से खाली

सो

सपने लौट गए

पलकों तक आ कर

दिल मे घुमड़ती रहीं

बेचैन घटाएँ

और राहत की उजास

कभी भेद ही नहीं पाई इस अँधेरे को

जल तरंग-सा बजता रहा दुख

स्त्री के हर अंग में

आज स्त्री ने समंदर को छुआ है

पहली बार उलीच रही है दुखों को बाहर

और सागर की नीलिमा में

उतार रही है खुद को

आज वह बहुत पास है समंदर के


लड़कियाँ::

लड़कियाँ

बिलकुल एक-सी होती हैं

एक-से होते हैं उनके आँसू

एक-सी होती हैं उनकी हिचकियाँ

और

एक-से होते हैं उनके दुखों के पहाड़

एक-सी इच्छाएँ

एक-सी चाहतें

एक-सी उमंगें

और एक-सी वीरानियाँ ज़िन्दगी की

सपनों में वे तैरती हैं अंतरिक्ष में

गोते लगाती हैं समुद्र में

लहरों सी उछलती-मचलती

हँसी से झाग-झाग भर जाती हैं वे

सपनों का राजकुमार

आता है घोड़े पर सवार

और पटक देता है उन्हें संवेदना रहित

बीहड़ इलाके में

सकते में आ जाती हैं लड़कियाँ

अवाक् रह जाती हैं

अविश्वास में धार-धार फूटती हैं

बिलखती हैं

सँभलती हैं,

फिर लड़ती हैं लड़कियाँ

और यों थोड़ा-थोड़ा आगे बढ़ती हैं

ज़िन्दगी की डोर

अपने हाथ में थामने की कोशिश करती हैं

19 टिप्‍पणियां:

  1. आज स्त्री ने समंदर को छुआ है

    पहली बार उलीच रही है दुखों को बाहर

    और सागर की नीलिमा में

    उतार रही है खुद को

    आज वह बहुत पास है समंदर के



    सँभलती हैं,

    फिर लड़ती हैं लड़कियाँ

    और यों थोड़ा-थोड़ा आगे बढ़ती हैं

    ज़िन्दगी की डोर

    अपने हाथ में थामने की कोशिश करती हैं

    यह है वो जो नारी को होना चाहिए ....बहुत बढ़िया

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  2. बढूँगी सुबह की किरणों की मानिंद
    और रात होते-होते चाँदनी में बदल जाऊँगी.

    यही है जीवन .. प्रकाश और आलोक के बीच कही...
    सृजनात्मक यात्रा ज़ारी रहनी चाहिए...बधाई

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  3. जिस दुनिया में
    संतृप्त
    ऊबे हुए मेरे साथी पुरुष
    अब कुछ बचा ही नहीं
    तुम्हारे लिए
    जहाँ
    जिस दुनिया में
    चीज़ें शुरू होती हैं
    वहीं से
    मेरे लिये
    -------- बहुत खूब..
    अच्छी कविताएं... पर मन नहीं भरा...

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  4. सरल भाषा मे संध्या जी की कविताएं बहुत अच्छी लगीं।


    सादर

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  5. कभी भेद ही नहीं पाई इस अँधेरे को

    जल तरंग-सा बजता रहा दुख

    स्त्री के हर अंग में

    आज स्त्री ने समंदर को छुआ है

    पहली बार उलीच रही है दुखों को बाहर

    ........................... चलिए इतना तो हुआ...बहुत सुंदर लेखन आपका...

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  6. सुन्दर प्यारी अभिव्यक्ति...

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  7. क्या कहूं ? यही कि बड़ी खूबसूरत हैं ये कवितायेँ ! जैसे ज़िंदगी खुद को आईने में निहारे और कभी खुश तो कभी उदास हो जाये ! बधाई निवेदिता जी को और अपर्णा जी को धन्यवाद !

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  8. एक-से होते हैं उनके आँसू

    एक-सी होती हैं उनकी हिचकियाँ

    bilkul sahi.. sundar sampreshan

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  9. लड़कियाँ

    बिलकुल एक-सी होती हैं.........

    इस सच को जानने के लिए भले ही कोई भी विज्ञान अभी तक नही बना लेकिन आदमी की सोच और संवेदना ने हज़ारों वर्षों की चेतना-यात्रा करके इसे कितनी खूबसूरती से मात्र एक कविता के जरिये बखूबी जान लिया है. आदमी के ऐसे ही शास्वत सत्य का उदघाटन करने के लिए अपनी-अपनी भाषा में दुनिया के तमाम कवि चिंतन सृजन में लगे हुए हैं. जिसमें समाज संस्कृति, भाषा सभी कुछ उसके सहयोगी के रूप में शामिल हैं. कवियत्री नवोदित को ढेर सारी बधाइयां.

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  10. Is matlabi aur samvednaheen samaaz mein rah kar bahut dino baa in khubsurat sabd rachna ko pad kar phir se jeene ki tamanna ho gayi.Thanx aur dher sari badhai.
    Pankaj Bhatnagar

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  11. Aaj ke samvedanheen aur matalbi daur mein bahut dino ke baad itni khubsurat shabd rachna dekh kar ek baar phir se jeene ki tammna jaag gayi. thanx.

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  12. यथार्थ को कहती सुन्दर अभिव्यक्ति

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  13. जीवन में फूलों, खुशबुओं और खुशियों की अनंत आस लिये स्‍त्री जब इस सचाई से रूबरू होती है कि सपने लौट गये हैं पलकों तक आकर, कि खुशियां गुजर गई हैं किनारे होकर और सामने जो खड़ा है दुखों का पहाड़, उसे अकेले ही जूझना है इन बीहड़ हालात से। कुछ इसी तरह के अनकहे अवसाद को व्‍यक्‍त करती ये कविताएं हमारे समय के यथार्थ को कितनी मार्मिकता से बयान कर गई हैं - "अपनी आँखें नहीं रहीं /कभी आँसुओं से खाली /सो सपने लौट गए
    पलकों तक आ कर /दिल मे घुमड़ती रहीं /बेचैन घटाएँ/और राहत की उजास /कभी भेद ही नहीं पाई इस अँधेरे को /जल तरंग-सा बजता रहा दुख /स्त्री के हर अंग में /आज स्त्री ने समंदर को छुआ है" संध्‍या नवोदिता ने वाकई इन जानदार कविताओं के साथ स्‍त्री के संघर्ष को नयी अर्थवत्‍ता दी है। बधाई।

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  14. आप सब ने कविताओं को पढ़ा और अपनी राय दी ... आभारी हूँ .
    शुक्रिया अपर्णा दी..

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  15. सुमन केशरी12 सितंबर 2011 को 3:59 am

    सुंदर कविताएँ, सच में बड़ा अच्छा लगा पढ़ना... बधाई.

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