प्रीति चौधरी:

प्रीति चौधरी की कविताएँ वहां से शुरू होती हैं जहाँ से प्रतिरोध का स्वर शुरू होता है. ये कविताएँ बयान पर ख़त्म नहीं होतीं बल्कि कठिन समय में संधान और समाधान की तरफ बढती हैं,लिहाज़ा वे न रूपकों की मोहताज़ हैं और न बिम्ब में अपना चेहरा देखने की कोशिश में .


आप अगर जायें आगरा:

आप अगर जायें आगरा तो                                   
मत मिलिएगा जमीर खान से
जमीर खान उसी खानदान से हैं
जिसने दफनाया था मुमताज को
जमीर खान ऐसे गाइड हैं
जिन पर इतिहास तोड़ने मोड़ने के आरोप में
जारी हो सकता है फतवा

साहब आप घूमने जाते हैं आगरा
अतुल्य भारत की शान है आगरा
आगरा का मतलब है विदेशी मुद्रा
आगरा का मतलब मुहब्बत है

और वहाँ कोर्इ जमीर खान बताने लगे कि
मुमताज और शाहजहाँ के असली मकबरे
दबे हैं दो तल नीचे
जिस तल का ताला नहीं खुलता कभी
                                                                              
मुमताज के दफनाते ही भरी थी वहाँ ऐसी बदबू कि
ताज क्या पूरी मुगल सल्तनत का घुट जाता दम

जमीर खान का कहना है
ये बदबू शाहजहाँ की बहनों और
मुगल शहजादियों की आहों से मिलकर बनी थी
जिसे मिटा ना सका र्इरान का इत्र भी
ये शहजादियाँ 
आगरा किले के झरोखे से
मुहब्बत की निशानी ताज को ताकतीं ईर्ष्या से
कनिजों के साथ खेलतीं
चौपड़, चौसर, छुपा छुपार्इ

महल की दीवार के आलों और ताखों में
भरे रहते हीरे, जवाहरात, मोती, बेशकीमती रत्न
जिन्हें वार देती कनिजों पर
शहजादियां जब खुश होतीं
शहजादियां खातीं सोने के बर्तन में
चाँदी के गिलास में पीतीं पानी
शहजादियां लगवातीं उबटन गुलाब की पंखुरी का
शहजादियों के केश गमकते चंदन के लेप से

शहजादियां कर सकतीं थीं सब कुछ
सिवाय मुहब्बत के
शहजादियां
गुलामों को अता कर सकती थीं जागीरें
नाराज होने पर
हाथी के पांव तले उन्हें कुचलवा सकती थीं पर
शहजादियां, नहीं खा सकती थीं बाहर की हवा

वे करती थीं रश्क उस नन्हीं चिडि़या से
जो किले के परकोटे से फुर्र उड़
तैरने लगतीं ऊँचे आकाश में

पता नहीं क्यों
मुझे लगता है
मुगल काल में रियाया का हाल चाहे जो हो
मुगलों की बेटियां बेहद उदास थीं

उनके आँसुओं की शिनाख्त
आगरा किले में
आप भी कर सकते हैं.


भूगोल की किताब

लिखा है किताब में भूगोल की
हज़ारों साल पहले
हिमालय की जगह
था कोर्इ महासागर टेथिस                                           

दरअसल
हिमालय, हिमालय की ऊँचार्इ पाने से पहले
छिपा था टेथिस की गहरार्इ में

गोंडवाना और तिब्बत के भूखण्डों के बीच
टकराता, घायल, लहूलुहान सदियों तक
संजोता रहा चोटों को

जब्त किया कितना कि
गहरा गया इतना
ऊँचा उठा तो हो गया हिमालय

अब टेथिस थी या था
इसका फैसला करता रहे व्याकरण                              

मेरे लिए यदि
टेथिस थी तो वो रच रही थी
स्त्री विमर्ष की पूर्व पीठिका
टेथिस था तो
बन रहा था हाशिए का आख्यान

ख़ैर जो भी हो
महत्वपूर्ण ये है कि
सारी चोटों को एक दिन
हिमालय जितना ऊँचा उठ जाना चाहिए.


दिल्ली और झांसी जाने में

बहुत फर्क है
दिल्ली और झांसी जाने में
राजनीति, कला, साहित्य, संस्कृति
सबकी मुस्तकबिल है दिल्ली

दिल्ली गालिब की हो या
इंदिरा गांधी अंतर्राष्ट्रीय विमान पत्तन की
कायदन मुझे भी
जाना चाहिए दिल्ली ही
पर मुड़ जाना मेरा
झांसी की तरफ
संदिग्ध है पर्याप्त

दिल्ली की बजाय जाना झांसी
मेरा, मेरे ही खिलाफ है षडयंत्र कोर्इ
किसी भयंकर योजना का ब्लुप्रिंट

बुंदेलखण्ड के सूखे और
सहरिया जनजाति के पिछड़ेपन में से
कौन सा विषय है ज्यादा शानदार
किसपे बनाऊँ मैं अध्ययन प्रस्ताव

और रचूँ ऐसे वाक्य कि
मिल जायें प्रयोजक                                                        
पा जाऊँ कोर्इ लंबा अनुदान

घूमने के बाद
ओरछा का किला
गूगल से पूछूंगी 
यु एस एड के किसी बड़े अधिकारी का पता
उससे करूंगी चैट मैं देर रात
हो सकता है किसी दिन
बिल गेटस ही मिल जाए आनलाइन
झांसी से दिल्ली होते हुए
पहुँच जाऊँ मैं न्यूयार्क
गरीबी के अध्ययन की
एक अदद ऊँची उड़ान.

सत्तर साल की महिला ने क्यों चुराया लाल गुलाब

वो वृद्ध स्त्री
जिसके एक एक कदम
खासी जददोजहद के बाद पड़ पा रहे थे पृथ्वी पर
अपने पांवो के साथ उपने सत्तर साल ढोते
आखिर क्या सोचकर
पहुँची होगी लोहिया पार्क की उस क्यारी तक
जहां बडे़ और साफ अक्षरों में लिखा था
फूल तोड़ना मना है

स्त्री ने कांपते हाथों से तपाक से तोड़ा
सबसे खुबसूरत लाल गुलाब
और सबकी नजर से बचाते हुए
डाल लिया कोट की जेब में

तब से मैं सोच रही
सत्तर साल की उम्र में                                                       
क्यों चुराती है कोर्इ स्त्री गुलाब
क्या याद आ गयी उसे बचपन की वो फ्राक
जिस पर बने थे लाल गुलाब
या फिर याद आर गया वो गुलाब
जो उसके जूडे़ में खोंसते खोंसते रह गया था कोर्इ
या फिर जिंदगी के बिस्तर पर उसे चुभे इतने कांटे
कि एक बार उसे गुलाब की पंखुड़ी पे सोने की इच्छा हो आयी

दोस्तों आप बता सकते हैं
सत्तर साल की उस स्त्री ने क्यों चुराया लाल गुलाब?


नहीं हूँ मैं मौलिक

मान्यवर
सटीक टिप्पणी है आपकी
नहीं हूँ मैं मौलिक

कर्इ बार अपना नाम बताते हुए
गहरे संशय से भर जाती हूँ
कि मेरा नाम वास्तव में प्रीति चौधरी है
इशरत जहां या नीलोफर गोपियां तो नहीं

मान्यवर
मौलिकता बहुत दूर
चरित्र भी दोहरा है मेरा
मैं सिर्फ प्रीति चौधरी होती तो
मंदिरों का स्थापत्य देखती
देवताओं की विशाल भुजाओं में बंधती
देवियों के स्तनों और नितम्बों को निहारती

किंतु मेरे भीतर हैं
कर्इ-कर्इ स्त्रियाँ                                                             
मेरी मां नैनतारा
मध्यकालीन संत मीरा
वैशाली की आम्रपाली
उरूवेला की सुजाता

ईश्वर बनाने और पाने में सक्षम स्त्रियाँ 
दैहिक कामनाओं को भक्ति में सानती
पवित्र सी स्त्रियाँ 

मान्यवर
आपका निर्णय
सिर आँखो पे

नहीं हूँ मैं मौलिक
आपके दक्षिणपंथी प्रश्नों के
वामपंथी, उत्तर आधुनिक और अस्मितावादी उत्तर भी
मैंने दूसरों की सहायता से दिये

आपने सही कहा
समाजविज्ञान से लेकर कविता तक में
(मेरे लिए कुछ नहीं है)
मेरे किसी योगदान की संभावना नहीं

मस्तिष्क छोडि़ए
मेरी आत्मा की छटपटाहट भी मौलिक नहीं

निराला और मुक्तिबोध के पैरों से निकली है
वो सारी हिरणी, चिडि़या और चीटियां भी
जिनके ऊपर मैं कविता लिखना चाहती हूँ
एक समकालीन कवि ने पेटेंट करा ली है

आदरणीय मुक्तिबोध जी
आप बताइए
मैं साक्षात्कार देने कहाँ जाऊँ
दिल्ली या उज्जैन

कहां मिलेंगे निष्पक्ष न्यायधीश 

मेरा विनम्र निवेदन है कि
मैं मनुष्य भर हूँ
सत्ताओं के अहंकारी वर्चस्व के मध्य
शांत प्रतिरोध करती एक मुक्कमल इंसान

अध्यक्ष महोदय
मुझे गौर से देखिए
मैंने बुद्ध से भी थोड़ी
करूणा, क्षमा और उदारता चुरा ली है.

न्याय एक पासवर्ड है

दीवाने ख़ास की उस भरी सभा में
राजा के सिपहसालार ने घोषणा की

जनता को न्याय मिलना चाहिए 
   
मुख्य सचिव ने नोट किया
न्याय मिलना चाहिए
समस्त प्रमुख सचिवों ने
हरी स्याही से लिखा
शासन की मंशा है कि
जनता को न्याय मिलना चाहिए

जिलाधिकारियों ने जिलों को कूच किया
रटते हुए कि
जनता को न्याय मिलना चाहिए

अखबारों में भी राजकोष से लाखों के विज्ञापन गये
जनता को न्याय मिलना चाहिए
राजा के मिशन की
दुंदुभी बज गयी चहुँ ओर
बस जनता ही थी
जो इस मुहिम पे यक़ीन न कर सकी

किसी ने घर-घर एक पुर्जी पहुँचा दी
जिस पर पेंसिल से लिखा था
न्याय एक पासवर्ड है

अधिनायकत्व, चोरबाजारी और भड़ुवागिरी को
लोकतांत्रिक अनुष्ठान कर,
शासनादेशों में झूठी इबारत
लिखने की एक खतरनाक साजिश.






















         
                                                                                       
                                                                                                                                                         



                                                                                                                                                           प्रीति चौधरी 

                                                                                                                     कवयित्री 
                                                                                                                     उच्च  शिक्षा जे एन यू से 
                                                                                             व्याख्याता अवध गर्ल्स पी.जी. कॉलेज,लखनऊ

13 टिप्‍पणियां:

  1. शानदार है इन कविताओं की धार !प्रीति चौधरी को इन सराहनीय व्यग्य रचनाओं के लिए बधाई !

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  2. इतिहास और अपने समय की निर्मम सचाइयों के प्रति गहरे जागरूकताबोध से रची प्रीति चौधरी की ये सहज कविताएं, देर तक मन-मस्तिष्‍क पर अपना असर बनाए रखती हैं। उनके अनुभव-संसार का फलक विस्‍तृत है, अपने समय के सामाजिक-राजनीतिक हालात पर ये कविताएं गहरी संवेदनात्‍मक टिप्‍पणी करती हैं। प्रीति को शुभकामनाएं।

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  3. एतिहासिक पृष्ठभूमि से निकली कटु सच को बयां करती अद्भुद कविताये है .संवेदना से भरी हुई ,मन मष्तिष्क में अंकित हो जाती है ....प्रीति जी को शुभकामनाये

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  4. अंजू शर्मा
    अच्छी लगी कवितायें, इनमें निहित बेचैनी एक प्रश्नचिन्ह के रूप में साधिकार सामने आती है ......प्रीति को पहली बार पढ़ा, उन्हे बधाई, शुभकामनायें और फूलों का शुक्रिया ...........

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  5. बहुत दिनों के बाद यहां यानि ' आपका साथ, साथ फूलों का ' पर आ पाया और यही वजह रही की इतनी उम्दा कविताएं, बहुत दिनों के बाद ही पढ़ पाया।

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  6. अध्यक्ष महोदय
    मुझे गौर से देखिए
    मैंने बुद्ध से भी थोड़ी
    करूणा, क्षमा और उदारता चुरा ली है....बेहद सारगर्भित अंदाज़ में बहुत कुछ पढने को मिला ! बधाई प्रीति..शुक्रिया अपर्णा !

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  7. बहुत सुन्दर और सार्थक प्रस्तुति!

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  8. सभी रचनायें सशक्त और बेहद उम्दा , सरोकारों से जुडी

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  9. मेरे ख्याल से इनमे से कुछ कवितायें मैंने पहले कहीं पढ़ी है | शायद तद्भव में | मुझे वे बहुत अच्छी लगी थी | आज कुछ और कविताओं को उनके साथ पढ़ा | और भी अच्छा लगा | उन्हें हमारी बधाई

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  10. प्रीति चौधरी की कविताएं पढ़ते हुए लगा कि आज भी एक स्‍त्री के पास कितनी तरह के सवाल हैं जो इतिहास से लेकर वर्तमान तक से जवाब मांग रहे हैं... कितने अनुत्‍तरित प्रश्‍न हैं... व्‍यंग्‍य की तीखी धार के साथ उनका कहन बहुत प्रभावी है... सभी कविताएं बहुत अच्‍छी हैं... लेकिन मैं जिस जगह पर जाकर मुग्‍ध हुआ, उसे कहने का साहस पहली बार किसी स्‍त्री ने किया...
    ईश्वर बनाने और पाने में सक्षम स्त्रियाँ
    दैहिक कामनाओं को भक्ति में सानती
    पवित्र सी स्त्रियाँ
    ... मीरा को कई कोणों से पढ़ते हुए मैं कई बार इस पहलू पर सोचता रहा और आखिर आज एक कवयित्री के शब्‍दों में जैसे बहुत कुछ मिल गया... बधाई और शुभकामनाएं प्रीति चौधरी के लिए... फूलों का शुक्रिया।

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