प्रतिभा कटियार ::

















1.

मैं उसे प्यार करता था
इतना कि
दूर चला गया उससे
ताकि महसूस कर सकूं
जुंबिश उसकी चाहत की
हर पल

मैं उसे खुश देखना चाहता था
इतना कि
मैंने हटा लीं अपने नजरें
उस पर से
ताकि नजर न आ सके
एक भी आंसू

मैं पाना चाहता था सानिध्य
दूध और पानी जैसा
और मैंने
छुड़ा लिया दामन कि
ये ख्वाब,
बचा ही रहे साबुत

मैं बहुत जोर से हंसना चाहता था
इतनी तेज कि
मेरे भीतर का विषाद
घबराकर दम तोड़ दे
भीतर ही...

मैं बो देना चाहता था खुशियों के बीज
समूची धरती पर
इसलिए उठा लिए हथियार
कि इनसे लडऩे को ही
आतुर हो उठें मुस्कुराहटें


मैं तुम्हें रोकना चाहता था
इसलिए मैंने जाने दिया तुम्हें
ताकि रोकने की उस चाहत को
रोके रह सकूं सीने में
हमेशा...


2.

वो उतरती शाम का धुंधलका था
शायद गोधूलि की बेला

बैलों की गले में बंधी घंटियों की रिद्म
उनके लौटते हुए सुस्त कदम और
दिन भर की थकान उतारने को आतुर सूरज
कितने बेफिक्र से तुम लेटे हुए
उतरती शाम की खामोशी को
पी रहे थे
जी रहे थे.

तुम शाम देख रहे थे
मैं तुम्हें...
तुम्हारी सिगरेट के मुहाने पर
राख जमा हो चुकी थी.
कभी भी झड़ सकती थी वो
बैलों की घंटियों की आवाज से भी
हवाओं में व्याप्त सुर लहरियों से भी
मैं उस राख को एकटक देख रही थी

तुम बेफिक्र थे इससे कि
वो जो राख है सिगरेट के मुहाने पर
असल में मैं ही हूं
तुम्हारे प्यार की आग में जली-बुझी सी

कमरे में कोई ऐश ट्रे भी नहीं...
(अमृता और मरीना की याद में)

3.


जानती थी
क्या होती है प्रतीक्षा,
कैसा होता है दु:ख
अवसाद, अंधेरा,
किस कदर
मूक कर जाता है
किसी उम्मीद का टूटना,
फिर भी
मैंने चुना प्रेम!

 
4.

सारे सुखन तुम्हारे

लो फूल सारे तुम रख लो अब से. मुझे नहीं चाहिए, कांटे ठीक हैं मेरे लिए. कांटों के मुरझाने का कोई खतरा नहीं होता. न ही इनकी परवरिश करनी पड़ती है. सुख तुम पर खूब खिलते हैं. ये तुम्हारे लिए ही बने लगते हैं सारे के सारे. सच्ची, इनका तुम्हारा नाता पुराना है.ये भी तुम्हारे हुए.मैं क्या करूंगी इनका.मेरे लिए इनकी कोई अहमियत नहीं. बेजार हूं मैं सुखों से.इनके होने न होने से कोई फर्क नहीं पड़ता है मुझे. बल्कि कभी कोई सुख गलती से टकरा जाता है तो उसके टूटने का भय खाये रहता है हरदम. चांद-वांद चांदनी-वांदनी भी नहीं चाहिए मुझे, लो सारी चांद रातें तुम रख लो.मैं अमावस की रातों पर अपने गम का चांद उगा लूंगी.

बरसती हुई अमावस की रातों का स्वाद भाता है मुझे. कभी चखा है तुमने?
नहीं...नहीं.... ये स्वाद तुम्हारे लिए नहीं है. धरती भी तुम रख लो, आसमान भी. मेरे लिए तो क्षितिज ही काफी है.अनंत के छोर पर दिखता एक ख्वाब सा क्षितिज.

देह भी तुम ही धरो प्रिय निर्मल, कोमल, सुंदर देह सजाओ, संवारो इसे, मेरे लिए तो मेरी रूह ही भली.

जल्दी करो, समेटो अपनी चीजें किसी के बूटों की आवाज आ रही है सिपाही होगा शायद या फिर कोई चोर-उचक्का भी हो सकता है. मांगने लगेगा वो भी हिस्सा या फिर छीन ही लेगा वो तो सारी चीजें. तुम जल्दी से चले जाओ सब लेकर यहां से मुझे कुछ नहीं होगा

मेरी चीजों में कोई दिलचस्पी नहीं होगी किसी को $जरा भी नहीं. मैं आजाद हूं अब दुनिया के हर ख़ौफ से.

 5.


न आवाज़ कोई, इंतजार
वैसे, इतना बुरा भी नहीं
फासलों के बीच
प्रेम को उगने देना
अनकहे को सुनना,
अनदिखे को देखना
फासलों के बीच भटकना.
आवाजों के मोल चुकाने की ताकत
अब नहीं है मुझमें
शब्दों के जंगल में भटकने की.
न ताकत है दूर जाने की
न पास आने की.
बस एक आदत है
सांस लेने की और
तीन अक्षरों की त्रिवेणी
में रच-बस जाने की.
तुम्हारे नाम के वे तीन अक्षर...

  

14 टिप्‍पणियां:

  1. कल्‍पना के जंगल में उड़ान भरती गल
    जो गलाती नहीं है
    गलने से बचाती है
    विचारों को
    सोच को
    नीयत और प्रीति को।

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  2. Behad khoobsurat...janti thi kya hoti hai pratikhsha..kaisa hota hai dukh.. phir bhi maine chuna pream..man ko chuti hue....bina tripathi

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  3. जानती थी
    क्या होती है प्रतीक्षा,
    कैसा होता है दु:ख
    अवसाद, अंधेरा,
    किस कदर
    मूक कर जाता है
    किसी उम्मीद का टूटना,
    फिर भी
    मैंने चुना प्रेम!

    khoobsoorti se racha gaya hai in panktiyon ko.

    aur fir awazon ke mol chukane ki takat to shayad gulzar bhi nahi rakhte

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  4. तुम बेफिक्र थे इससे कि
    वो जो राख है सिगरेट के मुहाने पर
    असल में मैं ही हूं
    तुम्हारे प्यार की आग में जली-बुझी सी.....

    गहरी संवेदना
    बहुत सुन्दर ...आभार

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  5. प्रतिभा जी.. अभी अभी पढ़ा है... विस्तार से बाद में बात होगी.. अभी सिर्फ सुंदर ही कह सकता हूँ... बहुत अच्छा...
    धन्यवाद..
    मानव

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  6. laazwab
    yeh silsila chalta rahe.aap ruhani likhti rahe aur hum usse mahsus karte rahe.

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