सुमन केशरी ::















प्रेम 

1.

ओम् की मूल ध्वनि सा
तुम्हारा प्यार
मस्तिष्क की भीतरी शिराओं तक गूंज गया है
और मुझे हिलोर गया है अंदर तक

एक गहरी सी टीस रह रह कर उठती है
और मन शिशु की तरह माँ का वक्ष टटोलता है

मैंने तुम्हारे प्रेम को कुछ इस तरह महसूसा
जैसे कि माँ बच्चे के कोमल नन्हें अनछुए होंठों को
पहली बार अनचीन्हे से अंदाज में महसूसती है

दर्द का तनाव अपने सिरजे को छाती से लगाते ही
आह्लाद की धारा में फूट बहता है क्रमश:

गालों पर दूध की बुंदकियां लगाए नन्हें से
बच्चे से तुम
अपने विशाल कलेवर के साथ खड़े हो
मेरे सम्मुख

मैं गंगोत्री की तरह फूट पड़ी हूं।

2.


रात के उस पहर में
जब कोई न था पास
सिवाय कुछ स्मृतियों के
सिवाय कुछ कही-अनकही चाहों
और कुछ अस्फुट शब्दों के
सिवाय एक अधूरे सन्नाटे के

उस वक्त मैंने तुम्हारे शब्दों को अपना बना लिया

सुनो
अब वे शब्द मेरे भी उतने ही
जितने तुम्हारे
या शायद अब वे मेरे ही हो गये हैं--गर्मजोशी से थामे हाथ।



याज्ञवल्क्य से बहस


1.

उसकी छुअन भर से
बदल गयी मैं घास में
बार-बार उगने और हरियाने को

2.

उसकी याद
ध्रुवतारा
वयस्तताओं के महाजंगल में
घोर उपेक्षाओं के सागर में
निर्मम व्यंग्यों औऱ कटाक्षों से तपते
मरुस्थल में
राह दिखाती
आँखों में मुस्काती....

3.

सूरज की रोशनी सा तुम्हारा प्यार
और मैं कमल
शतदल
स्वर्णिम आभा से भर उठता है मन
और गूंज जाता है
अनहद नाद।

12 टिप्‍पणियां:

  1. Badhai, Aparna itne sundar blog ke liye. Mera to man hai yah prem kavitaon, ya prem ki laghukathaon ka blog hi ban jaye vishudh roop se...par yah mera man hai...tum sambhavtah Prem ke sath kranti ki bhi bat karna chaho.
    Suman ji ki kavitayen sada ki tarah hazaro man ki ankahi kavitayen hain.
    Manisha kulshreshtha

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  2. सुन्दर कविताएँ.....
    क्षणिकाएं, जो थोड़े में ही बहुत कुछ कह रही हैं...साधुवाद!
    -सादर

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  3. सुमनजी की इन कविताओं में ग़जब की हार्दिकता और प्रेम की व्‍यापकता आकार लेती दीखती है। सचमुच वे समकालीन हिन्‍दी कविता में की धारा में "गंगोत्री की तरह फूट पड़ी" है। जितना वेग उतनी ही गहराई भी। बधाई।

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  4. गालों पर दूध की बुंदकियां लगाए नन्हें से
    बच्चे से तुम

    कितना पवित्र …

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  5. सुमन जी की कविताओं का शास्त्रीय रचाव और बौद्धिक गाम्भीर्य आज के थोड़े हल्के समय में चकित करता हैं. इनमें संवेदना की वह गंगोत्री भी है अपने वेग के साथ.
    ये कविताएँ रहेंगी.

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  6. बहुत सुन्दर रचनाये ,
    प्रेम की गहरी अनुभूति या
    अनुभूति की गहराई ,
    यहाँ यह अंतर मिट सा गया है !

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  7. पहली कविता प्रेम की पराकाष्ठा की कविता है सुमन जी जब प्रेम में ममत्व घुल जाता है. सुख लेने की नहीं देने की चाह बन जाता है. मगर इसे अभिव्यक्त कर पाना सहज नहीं और आपने इसे सहज कर दिया
    "अपने विशाल कलेवर के साथ खड़े हो
    मेरे सम्मुख
    मैं गंगोत्री की तरह फूट पड़ी हूं।" मनीषा कुलश्रेष्ठ

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  8. pyar ki sabhi anubhutiyon evam vivechanaon ke bawajud bhi
    kuch hai
    kuch to hai jo farz ki patwar thame
    jiwan ki ghanghor udasiyon me
    prem ke astitwa aur aochitya par
    ek gahara kala ,lal, safed aur na jane kitane
    rangon ko apane aap me samete hue
    ek prashan chinh hai.

    ankho me adhure sapano ka khandhar
    dur tak faila ho jiski aankhon me
    prem to kar le magar
    samvedanaon ke itane ya utane gahare tal par
    jina bhi
    apane aap me ek prashna chinh hai

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  9. ओम् की मूल ध्वनि सा
    तुम्हारा प्यार ... अत्यंत सुंदर उपमा ।
    भावपूर्ण रचनाएँ ।

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  10. ज्योत्स्ना शर्मा25 सितंबर 2012 को 5:07 am

    बहुत सुन्दर ...कोमल ..मधुर प्रस्तुति ...

    सूरज की रोशनी सा तुम्हारा प्यार
    और मैं कमल
    शतदल
    स्वर्णिम आभा से भर उठता है मन
    और गूंज जाता है
    अनहद नाद। ...अप्रतिम ..!!

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