आलोक धन्वा ::

















प्यार 

पुराने टूटे ट्रकों के पीछे मैंने किया प्यार
कई बार तो उनमें घुसकर
लतरों से भरे कबाड़ में जगह निकालते
शाम को अपना परदा बनाते हुए
अक्सर ही बिना झूठ
और बिना चाँद के

दूर था अवध का शहर लखनऊ
और रेख़ते से भीगी
उसकी दिलकश ज़बान फ़िलहाल कोई एक देश नहीं
गोधूलि में पहले तारे के सिवा
पीठ के पीछे जो शहर था
वह शहर था भी और नहीं भी था
बनते-बनते उसे
अभी बनना था

औरतों और बच्चों से ताज़ादम बस्तियों
की गलियाँ ही गलियाँ
इनसे बाहर निकलते
छिपते-छिपाते
ऊँचाई पर बने आधी दीवार वाले फुटपाथों
के आसमान को गले लगाते
हम पहुँचते सिनेमाघर के भीतर
अमर मैटिनी शो के अँधेरे में
मैंने प्यार किया

हमारी पढ़ाई थी थोड़ी
हमारे जीने के साधन थे बेहद कठोर
फ़ुरसत नहीं थी इतनी कि बहस करते
ख़ाक होने तक जाते भटकने
घनी आबादी में पले हमारे शरीर में
इतना कोलाहल था इतनी चाहत थी
कि वह जो एक सूना डर सताना शुरू करता है
प्रेम के साथ-साथ
हम उससे अनजान ही रहे लगभग

जैसे शादी ही थी हमारी मंजिल
हमारा ज़रिया आगे के सफ़र का

आखिर शादी की बात पक्की हो गयी
फिर तो जब भी काम से छुट्टी होती
साइकिल पर आगे बिठाकर
अपनी होने वाली बेग़म को
मैं निकल जाता था दूर
शहर के बाहर जाने वाली किसी
छायादार सड़क पर
साइकिल चलाते हुए
आँख चुराते हुए
कभी-कभी दोनों एक ही साथ
सीटी बजाते हुए किया प्यार

घर के लोग भी जल्दी ही
सहमत हो गये
मेहनत की रोटी खाने वाले हमारे परिवार
नहीं थे इतने जटिल इतने पत्थरदिल
कि हमें बार-बार मरते हुए देखते
हम नहीं थे उनके लिए ज़रा भी अजनबी
हमारा निर्दोष इंसान होना
उनके खून में भी मौजूद था

तो एक दिन हमारी शादी हुई राज़ी-ख़ुशी
घर-गृहस्थी बसाते हुए
मुहल्ले भर के परिवारों में आते-जाते हुए
हम अभी भी कर रहे हैं प्यार

आसपास के रंगरूट आशिक़ों का
पता मालूम नहीं करना पड़ता
वे तो महीना नहीं बीतता
कि हो जाते हैं मशहूर
उनकी मदद के लिए मैं रहता हूँ तैयार
मोटर के चक्के बदलकर
इंजन में तेल भरकर।


भागी हुई लडकियां 

एक

घर की जंजीरें
कितना ज्यादा दिखाई पड़ती हैं
जब घर से कोई लड़की भागती है

क्या उस रात की याद आ रही है
जो पुरानी फिल्मों में बार-बार आती थी
जब भी कोई लड़की घर से भगती थी?
बारिश से घिरे वे पत्थर के लैम्पपोस्ट
महज आंखों की बेचैनी दिखाने भर उनकी रोशनी?

और वे तमाम गाने रजतपरदों पर दीवानगी के
आज अपने ही घर में सच निकले!

क्या तुम यह सोचते थे
कि वे गाने महज अभिनेता-अभिनेत्रियों के लिए
रचे गए?
और वह खतरनाक अभिनय
लैला के ध्वंस का
जो मंच से अटूट उठता हुआ
दर्शकों की निजी जिन्दगियों में फैल जाता था?

दो 

तुम तो पढ कर सुनाओगे नहीं
कभी वह खत
जिसे भागने से पहले
वह अपनी मेज पर रख गई
तुम तो छुपाओगे पूरे जमाने से
उसका संवाद
चुराओगे उसका शीशा उसका पारा
उसका आबनूस
उसकी सात पालों वाली नाव
लेकिन कैसे चुराओगे
एक भागी हुई लड़की की उम्र
जो अभी काफी बची हो सकती है
उसके दुपट्टे के झुटपुटे में?

उसकी बची-खुची चीजों को
जला डालोगे?
उसकी अनुपस्थिति को भी जला डालोगे?
जो गूंज रही है उसकी उपस्थिति से
बहुत अधिक
सन्तूर की तरह
केश में

तीन 

उसे मिटाओगे
एक भागी हुई लड़की को मिटाओगे
उसके ही घर की हवा से
उसे वहां से भी मिटाओगे
उसका जो बचपन है तुम्हारे भीतर
वहां से भी
मैं जानता हूं
कुलीनता की हिंसा !

लेकिन उसके भागने की बात
याद से नहीं जाएगी
पुरानी पवनचिक्कयों की तरह

वह कोई पहली लड़की नहीं है
जो भागी है
और न वह अन्तिम लड़की होगी
अभी और भी लड़के होंगे
और भी लड़कियां होंगी
जो भागेंगे मार्च के महीने में

लड़की भागती है
जैसे फूलों गुम होती हुई
तारों में गुम होती हुई
तैराकी की पोशाक में दौड़ती हुई
खचाखच भरे जगरमगर स्टेडियम में

चार

अगर एक लड़की भागती है
तो यह हमेशा जरूरी नहीं है
कि कोई लड़का भी भागा होगा

कई दूसरे जीवन प्रसंग हैं
जिनके साथ वह जा सकती है
कुछ भी कर सकती है
महज जन्म देना ही स्त्री होना नहीं है

तुम्हारे उस टैंक जैसे बंद और मजबूत
घर से बाहर
लड़कियां काफी बदल चुकी हैं
मैं तुम्हें यह इजाजत नहीं दूंगा
कि तुम उसकी सम्भावना की भी तस्करी करो

वह कहीं भी हो सकती है
गिर सकती है
बिखर सकती है
लेकिन वह खुद शामिल होगी सब में
गलतियां भी खुद ही करेगी
सब कुछ देखेगी शुरू से अंत तक
अपना अंत भी देखती हुई जाएगी
किसी दूसरे की मृत्यु नहीं मरेगी

पांच

लड़की भागती है
जैसे सफेद घोड़े पर सवार
लालच और जुए के आरपार
जर्जर दूल्हों से
कितनी धूल उठती है

तुम
जो
पत्नियों को अलग रखते हो
वेश्याओं से
और प्रेमिकाओं को अलग रखते हो
पत्नियों से
कितना आतंकित होते हो
जब स्त्री बेखौफ भटकती है
ढूंढती हुई अपना व्यक्तित्व
एक ही साथ वेश्याओं और पत्नियों
और प्रमिकाओं में !

अब तो वह कहीं भी हो सकती है
उन आगामी देशों में
जहां प्रणय एक काम होगा पूरा का पूरा

छह 

कितनी-कितनी लड़कियां
भागती हैं मन ही मन
अपने रतजगे अपनी डायरी में
सचमुच की भागी लड़कियों से
उनकी आबादी बहुत बड़ी है

क्या तुम्हारे लिए कोई लड़की भागी?

क्या तुम्हारी रातों में
एक भी लाल मोरम वाली सड़क नहीं?

क्या तुम्हें दाम्पत्य दे दिया गया?
क्या तुम उसे उठा लाए
अपनी हैसियत अपनी ताकत से?
तुम उठा लाए एक ही बार में
एक स्त्री की तमाम रातें
उसके निधन के बाद की भी रातें !

तुम नहीं रोए पृथ्वी पर एक बार भी
किसी स्त्री के सीने से लगकर

सिर्फ आज की रात रुक जाओ
तुमसे नहीं कहा किसी स्त्री ने
सिर्फ आज की रात रुक जाओ
कितनी-कितनी बार कहा कितनी स्त्रियों ने दुनिया भर में
समुद्र के तमाम दरवाजों तक दौड़ती हुई आयीं वे

सिर्फ आज की रात रुक जाओ
और दुनिया जब तक रहेगी
सिर्फ आज की रात भी रहेगी


छतों पर लडकियां 

अब भी
छतों पर आती हैं लड़कियाँ
मेरी ज़िंदगी पर पड़ती हैं उनकी परछाइयाँ।
गो कि लड़कियाँ आयी हैं उन लड़कों के लिए
जो नीचे गलियों में ताश खेल रहे हैं
नाले के ऊपर बनी सीढियों पर और
फ़ुटपाथ के खुले चायख़ानों की बेंचों पर
चाय पी रहे हैं
उस लड़के को घेर कर
जो बहुत मीठा बजा रहा है माउथ ऑर्गन पर
आवारा और श्री 420 की अमर धुनें।

पत्रिकाओं की एक ज़मीन पर बिछी दुकान
सामने खड़े-खड़े कुछ नौजवान अख़बार भी पढ़ रहे हैं।
उनमें सभी छात्र नहीं हैं
कुछ बेरोज़गार हैं और कुछ नौकरीपेशा,
और कुछ लफंगे भी

लेकिन उन सभी के ख़ून में
इंतज़ार है एक लड़की का !
उन्हें उम्मीद है उन घरों और उन छतों से
किसी शाम प्यार आयेगा !




3 टिप्‍पणियां:

  1. कितनी-कितनी लड़कियां
    भागती हैं मन ही मन
    अपने रतजगे अपनी डायरी में
    सचमुच की भागी लड़कियों से
    उनकी आबादी बहुत बड़ी है

    बहुत ही गहरी अनुभूति है..

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  2. हर एक प्रस्तुति एक अलग से अंदाज़ में अभिव्यक्त हुई है, रचनाएँ सारगर्भित गहनता की अनुभूति से अभिभूत हैं...अलोक जी को साधुवाद!
    -सादर.

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  3. सामजिक रूढ़ियों से बेबाकी से बहस करता ,चुनौती देता
    प्रेम, जिसका दूसरा नाम शायद आजादी भी है ,
    सुन्दरता से अभिव्यक्त हुआ है रचनाओं में !

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