माधवी शर्मा गुलेरी::















हर रोज़::

हर रोज़

बेकल रात को

बुनती हूं मैं

इक नया सपना

कुछ सपने सदाबहार हैं

कोई तितली पकड़

बंद करना हौले से मुठ्ठी

या उड़ते जाना अविराम

मीलों आगे, दिशाहीन

हर सुबह देखती हूं

हथेली पर बिखरे

तितलियों के वो

रंग अनगिन

और

रंग देती हूं तुम्हें

हर सुबह देखती हूं

हथेली पर ठहरा वो

आकाश अनन्त

और

भर लेती हूं उड़ान

लिए साथ तुम्हें।





ख़ामोशी::

अंधेरा पसरा हुआ है

खिड़की के बाहर

घुप्प...

बियाबान है पूरी पहाड़ी

मद्धम सी एक लौ

दूर वीराने से निकल

खेल रही है आंख-मिचौली

यहां-वहां भटक रही

नन्हीं मशालों पर

जा अटकी हैं बोझिल नज़रें

जाने किस तलाश में है

टोली जुगनुओं की

बेसुर कुछ आवाज़ें

तिलचट्टे और झींगुर की

चीरे जा रही हैं

तलहटी में बिखरे सन्नाटे को

टिमटिमाते तारों ने

ओढ़ लिया है बादलों का लिहाफ़

और

तेज़ हवा के थपेड़ों से

झूलने लगा है कमरे से सटा

देवदार का दरख़्त

मैं खिड़की बंद कर लेती हूं



भीतर एक शोर था

सन्नाटे में डूबकर

ख़ामोश हो गया है जो।



विरह की कविता::

स्लेट की मेहराब वाला

लकड़ी का घर

हो गया है अब

मकान आलिशान

सुविधाओं से संपन्न

पर

सुक़ून से कोसों परे।

जर्द हो गया है बरगद

आग़ोश में जिसके

ग़ुज़रा बचपन

जवानी और

जेठ की कई दोपहरें।

तोड़ गया है दम

गुच्छेदार फूलों से

लदा अमलतास

सुनहली चादर से

ढक लेता था जो आंगन

कभी-कभी

मेरे अंधेरों को भी।

उदास रहती है

बिना क़श्ती के

ब्यास नदी

लांघ लिया है उसे

किसी पुरपेच पुल ने।

मेरा घर, मेरा गांव

मेरा नहीं रहा

मैं भी अब

मैं कहां रही।


बेनाम::

कोई-कोई दिन कितना

अलसाया हुआ होता है

सुस्त, निठल्ला

नाकाम सा

लेकिन मैं

कुछ न करते हुए भी

काम कर रही होती हूं

जैसे बिस्तर पर लेटे

करवटें बदलना

कई सौ बार

यादों की पैरहन उधेड़कर

सिल लेना उसमें

ख़ुद को

अरसा पुराने ख़्वाबों को

नए डिज़ाइन में

बुनने की कोशिश करना

फैंटेसी फ्लाइट में

बिना सीट बैल्ट के बैठना

जमकर हिचकोले खाना

फिर टाइम-अप के डर से

नीचे उतर आना

ज़हन में कुलबुलाते

उच्छृंखल विचारों पर

नक़ेल डालना ताकि

सब-कुछ बना रहे

ऐसा ही.. ख़ूबसूरत

बहुत सारे काम बाकी हैं

और आंखें उनींदी हो चली हैं

शाम का धुंधलका भी

छा गया है बाहर।

फलक होने के बाद::

मैं तुम्हें फलक की

उन ऊंचाइयों तक

पहुंचा देना चाहती हूं

जहां पहुंचकर तुम

तुम न रहो

फलक हो जाओ

लेकिन डरती हूं

फलक होने के बाद

कहीं तुम

ज़मीं से

अपना नाता न तोड़ लो।

16 टिप्‍पणियां:

  1. मन को हौले से स्पर्श करती हुई सुंदर रचनाओं के लियें आभार अपर्णा...माधवी जी को बधाई ...

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  2. बहुत सुन्दर कवितायेँ हैं माधवी. बहुत सारा प्यार और बधाई!

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  3. सभी रचनाएं बहुत सुंदर....

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  4. सारी रचनाएँ बेहतरीन हैं ... खासकर "बेनाम"

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  5. एक मुलायम अवसाद ,एक चिकनी पीड़ा से भरी कवितायेँ ! अपर्णा जी ,सुन्दर चयन !

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  6. 'फ़लक होने के बाद' आज के जीवन की सच्चाई है ! लेकिन, जीवन की इन विसंगतियों में जीने के मायने ढूंढना ही शायद 'कविता' है |

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  7. titli ko houle se mutthi me band kar kholne kee bat tabhi likh sakta hai koi jab khud likhane wale ka man pankh sa mulayam ho. aisi soch ke liye badhai baki kavitae bhi pyari hain.

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  8. मैं भी अब
    मैं कहां रही...
    विरह की कविता बेमिसाल लगी। बाकी कविताओं में भी अद्भुत सरलता, सहजता और सौन्दर्य छलकता है.... धन्यवाद स्वीकारें।

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  9. हर सुबह देखती हूं

    हथेली पर ठहरा वो

    आकाश अनन्त

    और

    भर लेती हूं उड़ान

    लिए साथ तुम्हें।

    बहुत ही उम्दा ...कोमल सा अहसास और मन सिहराती हुई सुंदर रचनाये ....बधाई

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  10. ख़ूबसूरत चेहरे वाली की ख़ूबसूरत कविताएं.. दिल को छू गईं कुछ.. आत्मा को छू गईं कुछ.. अस्तित्व को छू गईं कुछ..

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  11. Liked Har roz. You have used such simple words to express love. Solicitous, explicit but not too direct.

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