बाबुषा ::



तिलिस्म ::


मत ढूंढो मुझे शब्दों में 
मैं मात्राओं में पूरी नहीं 
व्याकरण के लिए चुनौती हूँ
न खोजो मुझे रागों में 
शास्त्रीय से दूर आवारा स्वर  हूँ
एक तिलिस्मी धुन हूँ
मेरे पैरों  की थाप
महज कदमताल नहीं
एक आदिम  जिप्सी नृत्य हूँ
अपने पैने नाखूनों को कुतर डालो
मेरी तलाश में मुझे मत नोचो
एक नदी जो सो रही है भीतर कहीं
उसे छूने की चाह में मुझे मत खोदो
मत चीरो फाड़ो 
कि मेरी नाभि से ही उगते हैं रहस्य
इस सुगंध को पीना ही मुझे पीना है
मुझे पा लेना मुट्ठी भर मिट्टी पाने के बराबर है 
मुझमें खोना ही  अनंत आकाश को समेट लेना है
स्वप्न हूँ भ्रम हूँ मरीचिका मैं
सत्य हूँ सागर हूँ मैं अमृत ..



मुक्ति का उत्सव ::

आज की रात मैं
सड़क पर ही काटूँगी
ओढ़ के आसमान की चादर
चांद को जूड़े का फूल बना लूंगी 
चार दिशाएं होंगी अनंत मेरे कमरे की चार दीवारें 

मैं अंधेरे कोने की ढिबरी नहीं 
वह दिया हूं नन्‍हा-सा 
जिससे रोशनी पाने रोज़ उग आता है सूरज 

देखो यह अथक सड़क बुला रही मुझे
सदियों से प्रतीक्षारत विरहिणी की तरह बांहें फैलाए

उत्सव है यह
उड़ने का जुड़ने का खोने का होने का


आओ कि ख़त्‍म हो जाता है समय यहां 
आओ कि अनंत में कोई दूरी नहीं होती
आओ कि आ जाने की चाह से बड़ा बल क्‍या 
आओ कि आने से ही छिलेगा तुम्‍हारी आत्‍मा का आवरण

उत्सव है ये
जलने का बुझने का हंसने का रोने का


नाच है जैसे थिरकते हैं हल्‍की हवा में मेरे केस 
ये शामिल होना है मुझमें 
जैसे शामिल है हवा सृष्टि के हर निर्वात में भी
लाइलाज है मेरा प्रेम जिसे तुमने अपराध जाना 
पानी में घुलकर उसके रंग को काला कर देती है जैसे चाय 

अपराध कुछ वैसा ही !

उत्‍सव है यह 
घुलने का गलने का डिगने का थिरने का  

मैं शामिल हूं सबमें 
याद है वह लम्‍हा जब छू लिया था मैंने तुम्‍हें 
प्रेम के तिनके से 
लहकी थी गुदगुदी तुम्‍हारे कान के किनारे 

कैसे फैली थी तुम्‍हारी देह के हर हिस्‍से में 
अगले ही पल तुममें नेह का ज्‍वर जगा था

वह प्रेम का संक्रमण था 
मुक्ति की छूत 
लग गई अब तुमको 
बच के कहां जाओगे 
कितना भी भटको 
इसी सड़क आओगे !
 

नज़र का टीका ::


हथेली में लगा दिया है मैंने काला टीका
तकिये के नीचे ताबीज़ रख दिया है
तुम्हारी पीडाएं
तुम्हारा ज्वर
और तुम्हारे आंसू
मैं पानी में घोल कर पी जाउंगी
मेरे नीले पड़ चुके कंठ को
मत देखो
देखो मेरी मुस्‍कान
जो आंख की पुतली और दृष्टि के अनंत तक फैली हुई है

                      
तुम मेरे उनींदरे से बनी सलवट हो ::


मौसम की अंगडाई
या तुम्हारे आने की हलचल ?

भूगोल की किताब का बाँध तोड़ दिया है नदी ने
और मेरे घर की बालकनी में बह रही है
सीढ़ियाँ बदल गयी हैं पीले पहाड़ों में 
वेंटीलेटर में सुस्ता रही हैं पछुवा हवाएं
कुछ रंगीन चिड़ियां डिस्कवरी चैनल से निकल
ठोंगा मार रहीं मेरे दरवाज़े पर गीत प्रेम के गाने की ख़ातिर.
लॉन में क़ायदे से कुतरी गयी विलायती घास
निगाह के अंत तक फैल गई है
हरे समंदर की तरह


कल चाँद संतूर बजा रहा था ;
पूजाघर में बूढ़े मन्त्रों के साथ सुनी मैंने
कृष्ण की हंसी !


मैं करवट ले रही थी
सलवटों से भरा था हवा का बिस्‍तर

मौसम की अंगडाई
या तुम्हारे आने की हलचल ?

28 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सुन्दर!
    दीपावली, गोवर्धनपूजा और भातृदूज की शुभकामनाएँ!

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  2. बाबुषा की कवितायें पढ़ता रहा हूँ और बार - बार विचार को विलक्षण भाषा में बरतने की उनकी क्षमता का कायल होत रहा हूँ। आज यहाँ भी वह सब कुछ साक्षात देख रहा हूँ। अनुभूति और अभिव्यक्ति सहज संतुलन पर डोलती ये कवितायें भाती है। बाबुषा और 'आपका साथ' को बधाई!

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  3. बाबुशा की कवितायों में बहुत कुछ है जो बनी बनाई इबारतों से दूर अपना अलग संसार रचता है. उसकी हर कविता मुक्ति का उत्सव है, आजादी का शंखनाद है. बधाई बाबुशा!

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  4. मेरी तलाश में मुझे मत नोचो
    एक नदी जो सो रही है भीतर कहीं
    उसे छूने की चाह में मुझे मत खोदो
    मत चीरो फाड़ो
    कि मेरी नाभि से ही उगते हैं रहस्य
    इस सुगंध को पीना ही मुझे पीना है... कविताओं में आवेग है.. जो साथ बहा ले जाता है.. इसीलिए पसंद है मुझे बाबुषा..

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  5. बाबुषा की तुलना बाबुषा से ही संभव है. विचार, अनुभव, भाषा कैसे गुंथ जाते हैं आपस में ! और पाठक को अपनी गिरफ़्त में ले ही नहीं लेते, बल्कि जकड़े रहते हैं.

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  6. भावों की उमडती नदी का नाम है बाबुषा.प्यार तिलिस्म और उन्माद से भरी सुन्दर कवितायेँ जहाँ चाँद संतूर बजाता है और समुद्र घर और मन में बहता हैं प्रेम बनकर. स्वप्न हूँ भ्रम हूँ मरीचिका मैं
    सत्य हूँ सागर हूँ मैं अमृत.यही नहीं और भी बहुत कुछ हो.बहुत बड़ा रहस्य जिसे जानने के लिए यह उम्र कम पड जाए
    .

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  7. बाबुषा कवितायें लिखती नही कविताये बुनती है|उन्हें इस बात का पता होता है कि उनके शब्द कितनी गरमाहट देगें,कितना पानी ,कितनी रोशनी, कितना धुंआ, कितनी राख,कितनी धूप और कितनी धूल होगी |यकीन मानिए उन्हे पढ़ते हुए यूँ लगता है जैसे किसी तिलिस्म से होकर गुजर रहे हैं |इस बात पर यकीन करना मेरे लिए कठिन होता है कि कोई इंसानी अंगुलियाँ ये सब लिख रही है मानो कोई है जो सिर्फ कवितायें बुनने के लिए ही इस धरती पर आता है और फिर ओझल हो जाता है |

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  8. मत ढूंढो मुझे शब्दों में
    मैं मात्राओं में पूरी नहीं
    व्याकरण के लिए चुनौती हूँ
    न खोजो मुझे रागों में
    शास्त्रीय से दूर आवारा स्वर हूँ
    एक तिलिस्मी धुन हूँ.........बाबू की हर कविता में रची बसी होती है बाबू की गंध, उसे सूंघते, महसूस करते हुए एक और परत हट जाती है, हर बार एक नया एहसास ऑंखें बंद कर खुद को एक पंख से सहलाने जैसा अहसास, अहसास हवा में उड़ने का, अहसास जाड़ें में आंच तपने जैसा.......

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  9. उत्सव है यह
    उड़ने का जुड़ने का खोने का होने का


    आओ कि ख़त्‍म हो जाता है समय यहां
    आओ कि अनंत में कोई दूरी नहीं होती
    आओ कि आ जाने की चाह से बड़ा बल क्‍या
    आओ कि आने से ही छिलेगा तुम्‍हारी आत्‍मा का आवरण.................बाबुषा के पास भाषा का नया तेवर भी है और मौलिकता भी ....... कवितायेँ पढ़कर अच्छा लगा...

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  10. "हथेली में लगा दिया है मैंने काला टीका
    तकिये के नीचे ताबीज़ रख दिया है
    तुम्हारी पीडाएं
    तुम्हारा ज्वर
    और तुम्हारे आंसू
    मैं पानी में घोल कर पी जाउंगी
    मेरे नीले पड़ चुके कंठ को
    मत देखो
    देखो मेरी मुस्‍कान
    जो आंख की पुतली और दृष्टि के अनंत तक फैली हुई है"..........आह कहूँ या वाह ???

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  11. आओ कि ख़त्‍म हो जाता है समय यहां
    आओ कि अनंत में कोई दूरी नहीं होती
    सुन्दर!

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  12. मैं अंधेरे कोने की ढिबरी नहीं
    वह दिया हूं नन्‍हा-सा
    जिससे रोशनी पाने रोज़ उग आता है सूरज..

    सुन्दर भावप्रवण कविताएँ...बधाई

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  13. "मैं अंधेरे कोने की ढिबरी नहीं
    वह दिया हूं नन्‍हा-सा
    जिससे रोशनी पाने रोज़ उग आता है सूरज...."

    आत्मविश्वास से भरपूर हैं बाबुषा की कविताएं.... उन्हें बधाई!

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  14. दिवाली के दूसरे दिन अपनी फेसबुकिया दीवार पर एक सुन्दर सरप्राइज़ देखा ! अपर्णा दीदी ने एक लिंक टंगा रखा था ..
    मैंने उन्हें तुरंत लिखा कि एक सनकी और पागल की आधी रात की लिखाई को आप कविता कहती हैं दीदी ?
    जवाब में उन्होंने मुझे अपने प्रेम और आशीर्वाद से भिगो दिया.
    मेरे ख़याल से आप लोगों को मेरा लिखा हुआ ठीक ठाक लग रहा है तो निश्चित ही ये आपकी ही कवितायें हैं ..बस मेरे माध्यम से बाहर आ गयीं .
    सभी को आभार.

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  15. मत ढूंढो मुझे शब्दों में
    मैं मात्राओं में पूरी नहीं
    व्याकरण के लिए चुनौती हूँ...वाह! बहुत ही सार्थक अभिवयक्ति....

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  16. बाबुशा, सिर्फ बाबुशा कहीं कुछ दिखा इन कविताओं की भावनापूर्ण अविरल धारा में तो सिर्फ ....बाबुशा! एक सुखद एहसास इन कविताओं के साथ! वाकई आपका साथ साथ फूलों का! वाह!!

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  17. यहाँ तो फूलों का और कांटो का साथ है... बहुत सुंदर कवितायें!!

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  18. बाबुषाजी ,,,आपके द्वारा लिखा हर लफ्ज़ इक जादू है,जिसे जितना पढों हर बार इक नयी परीभाषा देता है .बहुत सुन्दर लिखती है आप ,इस पागलपन को कभी कम मत होने देना .
    --अंजली कुलश्रेष्ठ

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  19. मेरी तलाश में मुझे मत नोचो

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  20. बहुत पसंद आई... ख़ास कर यह...

    मत ढूंढो मुझे शब्दों में
    मैं मात्राओं में पूरी नहीं
    व्याकरण के लिए चुनौती हूँ
    न खोजो मुझे रागों में
    शास्त्रीय से दूर आवारा स्वर हूँ
    एक तिलिस्मी धुन हूँ
    मेरे पैरों की थाप
    महज कदमताल नहीं
    एक आदिम जिप्सी नृत्य हूँ
    अपने पैने नाखूनों को कुतर डालो
    मेरी तलाश में मुझे मत नोचो
    एक नदी जो सो रही है भीतर कहीं
    उसे छूने की चाह में मुझे मत खोदो
    मत चीरो फाड़ो
    कि मेरी नाभि से ही उगते हैं रहस्य
    इस सुगंध को पीना ही मुझे पीना है
    मुझे पा लेना मुट्ठी भर मिट्टी पाने के बराबर है
    मुझमें खोना ही अनंत आकाश को समेट लेना है
    स्वप्न हूँ भ्रम हूँ मरीचिका मैं
    सत्य हूँ सागर हूँ मैं अमृत ..

    उत्तर देंहटाएं
  21. baat jab dil se nikalti hai to dil tak pahu_nchati hai.........bahut hi sundar kaviaye_n.

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  22. अवचेतन से निकली और कल कल बहती मुक्ति और बंधन की अद्भुत कवितायेँ.' स्वप्न हूँ भ्रम हूँ मरीचिका मैं सत्य हूँ सागर हूँ मैं अमृत'...
    बाबु की कवितायेँ रहस्य ,मृत्यु और प्रेम के आसपास घूमती हैं खुद के होने की घोषणा करके खुद को ख़ारिज कर देने के भाव के साथ. इन्हें पढ़कर अजीब सी बेचैनी महसूस होती है जो कहीं न कहीं औरतों की भीतरी दुनिया की आवाज है.

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  23. अवचेतन से निकली और कल कल बहती मुक्ति और बंधन की अद्भुत कवितायेँ.' स्वप्न हूँ भ्रम हूँ मरीचिका मैं सत्य हूँ सागर हूँ मैं अमृत'...
    बाबु की कवितायेँ रहस्य ,मृत्यु और प्रेम के आसपास घूमती हैं खुद के होने की घोषणा करके खुद को ख़ारिज कर देने के भाव के साथ. इन्हें पढ़कर अजीब सी बेचैनी महसूस होती है जो कहीं न कहीं औरतों की भीतरी दुनिया की आवाज है.

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  24. बाबू गजब की कवितायेँ हैं.प्रेम को अपना वजूद होने का कारण बना लिया है.इसे फ्रेंच में 'रेजों ड'एत्र' कहते हैं.प्रेम जादू,पाप, पुण्य,बंधन और मुक्ति सब कुछ है.आंसुओं से भरी राह पीडाओं की नाव में सफ़र कराती रहती है.किसी के आने की आहट मन के द्वार पर आ रही है .सपनों से बुनी गयी इन मार्मिक प्रेम कविताओं में संवेदना कोमलता से अभियक्त की गयी है.बाबु का स्वर और अंदाज औरों से बिलकुल भिन्न और मौलिक है.

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