प्रदीप सैनी ::





















तुम्हारी याद


एक राह है
जिसका मुकाम
मेरे हौंसले की उम्र है

साथ चली आई
यादों का रेवड़ हांकता है मुझे

सबसे प्यारा
नवजात लडखडाता हुआ
पीछे छूट गया मेमना है तुम्हारी याद

मैं उसे गोद में उठाये आगे बढ़ रहा हूँ .



हम सिर्फ़ रीमिक्स सुनते हैं

तुम्हे अच्छा लगता है यूँ
पास पास बैठ कर जब हम
एक ही इअरफ़ोन पर
साझा करते हुए गीत
लगा लेते हैं अपने एक एक कान में
इअरफ़ोन के अलहदा सिरे

यह आबिदा परवीन गा रही है
जो ऐसी बारिश का नाम है
जिसमें रूह को तन पर पहन भींज जाते हैं हम
कुछ ही देर में ये आवाज़ दूर होती जाती है
यह ख़ालिस हुनर की ख़ामी कह लें
वह  बाँध नहीं सकता बहुत देर
और आपको भीतर की ओर धकेल देता है

अब कोई दूसरी आवाज़ है
जो सुन रहा हूँ मैं
यह इस समय के वर्जित शब्दों से लबरेज़ एक गीत है
कहना मुश्किल है कि इसे आत्मा गा रही है या देह
संगीत कुछ जाना पहचाना सा मालूम होता है
गौर से सुनने पर ही जान पता हूँ
हम दोनों कि जुगलबंदी है यह तो

एक ही इअरफ़ोन पर एक साथ
उसे सुन रहे हैं हम एक कान से
हमारा दूसरा कान बाहर का शोर सुनता है

मैं सोचता हूँ कि तुम
इस वक़्त क्या सुन रही हो
तुम्हारा सुना हुआ मेरे सुने हुए से जुदा ही होगा
ओर रचे जा रहे से अलग तो यक़ीनन ही

इस तरह हम बाहर के शोर में
अपने ही संगीत का
दुसरे कान द्वारा किया गया रीमिक्स सुनते हैं.



प्रेम

प्रेम नहीं आता है कविता में
जब वह होता है
अपनी जड़ों के साथ
कहीं बहुत भीतर तक धँसा हुआ

वह आता है यहाँ
उजड़ा हुआ खाली हाथ
हमेशा लौट जाने के इंतजार में रहता है यहाँ

हर प्रेम कविता
विस्थापित शिविर ही तो होती है.



तुम्हें चूमना

शब्द कहते हैं जितना
छिपाते हैं उससे अधिक
वे छल के सबसे धारदार हथियार हैं

भाव भंगिमाएं भी
कतई विश्वसनीय नहीं
वे तो छलती आई हैं तब से
पैदा भी जब हुए नहीं थे शब्द

और देह
उसका अपना है दर्शन
व्यापार अपना
गौरखधंधा इतना अज़ब कि
इस भूलभुलैया में क्या मालूम
कोई राह कहीं पहुँचे भी या न पहुँचे

इस सब के बीच
मूक होकर भी
कितना मुखर है तुम्हें चूमना
बता देता है बहुत कुछ
और पारदर्शी इतना
देख सकते हैं हम
एक-दूसरे के भीतर का सच

चूमने में शामिल सिर्फ देह ही नहीं होती .



तुम्हारे लिए
     
1.

दुनिया के शोर.गुल में
जब हम चुपचाप
पूरे जतन से
तलाश रहे थे उसे
तभी हमारे सामने
खिलखिला उठी जिंदगी
जैसे लुकाछिपी में हँस पड़ता है
कभी कभी
ढूंढने वाले की नासमझी पर
छुपा हुआ बच्चा.

2.
     
जिंदगी की ज़बाँ पर
ये किस चीज़ का ज़ायका
तैरता है हर वक्त
बेअसर हो जाती है
मन की प्यास
तन की भूख

दूर.दूर रहते हुए भी
कौन में स्वाद से बंधे हैं
हम दोनों
रब जाने.

3.

मैं
शब्दों में
वो गर्माहट नहीं पाता
जो सर्दी की उस रात
महसूस की हुई तुम्हारी तपिश को
बयाँ कर सकूँ
जब वक्त उस लम्हें में
कैद हो गया था
और आज तक है

आज सुबह
जब गीली मिट्टी की खुशबू से
सराबोर है बाहर की हवा
मेरे भीतर का जंगल
उस बारिश की याद में
गा रहा है मल्हार
जो सिर्फ तुम बरसा सकती हो 

17 टिप्‍पणियां:

  1. प्यार से लबरेज ये कवितायेँ मुझे बहुत सुन्दर लगी.. कई बिम्ब और परिवेश बहुत आधुनिक हैं जो की आज की कविता की ज़रूरत भी है..
    जैसे की ईयर फोन पर एक गीत सुनना.. बहुत सुंदरता से स्मृति को बीन कर उठा लिया है प्रेम सहित ...
    पीछे छूट गया मेमना है तुम्हारी याद

    मैं उसे गोद में उठाये आगे बढ़ रहा हूँ .

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  2. यह मेमना मेरा जाना पहचाना सा है.......बहुत सुन्दर कविताएं ! प्रदीप सैनी को इस ब्लॉग पर बहुत पहले आ जाना चाहिए था.

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  3. बहुत बहुत सुन्दर रचनाएँ...आप बधाई स्वीकारें !!

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  4. हर प्रेम कविता
    विस्थापित शिविर ही तो होती है.

    सुन्दर कवितायेँ ! प्रेम की वायवीयता से परे यथार्थ की ओर झुकाव लिए हुए ! सराहनीय प्रस्तुति ! अपर्णा जी, अरुणदेव जी का आभार !

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  5. यह आबिदा परवीन गा रही है
    जो ऐसी बारिश का नाम है
    जिसमें रूह को तन पर पहन भींज जाते हैं हम
    कुछ ही देर में ये आवाज़ दूर होती जाती है
    यह ख़ालिस हुनर की ख़ामी कह लें
    वह बाँध नहीं सकता बहुत देर
    और आपको भीतर की ओर धकेल देता है............प्रेम के इत्र में डूबी रचनाएँ बहुत अच्छी लगीं !

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  6. पहली बार प्रदीप भाई की इतनी कविताएं एक साथ पढ़ने का अवसर मिला । अच्छा लगा । प्रदीप सैनी की ये प्रेम कविताएं पहाड़ी झरने की सी रवानगी लिए हुई हैं जिसकी उछलती बूँदों में बस भीगते जाने का मन करता है। इन कविताओं में प्रेम की गहरी अनुभूति भी है और एंद्रिकता भी। इनमें प्रेम ‘प्रेम ’ की तरह आता है ‘लव’ की तरह नहीं। एक ऐसी प्यास की तरह जो कभी बुझती नहीं बल्कि जितना पीओ उतनी ही बढ़ती जाती है। भौतिक दूरियाँ भी उसको कम नहीं कर पाती हैं। यहाँ प्रेम की स्मृतियाँ षरीरी और अषरीरी दोनों ही रूपों में मौजूद हैं। प्रेम में स्मृतियों का वजन सबसे अधिक होता है। बहुत मधुर होती हैं ये स्मृतियाँ। पूरी जिंदगी जीने के लिए काफी । यादों का यह रेवड़ निष्चित रूप से ‘नवजात मेमने‘ की तरह मुलायम और प्यारा होता है।उसे बस गोद में पकड़े रहने का मन करता है। प्रेम में सारी आवाजें गौण हो जाती हैं एक आवाज के सामने। वह आवाज ऐसी कि जिसे केवल कानों से ही नहीं बल्कि सभी ज्ञानेन्द्रियों से सुना जाता है। प्रत्येक ज्ञानेन्द्रीय एक-दूसरे का काम करने लग जाती हैं। मन और देह का अंतर मिट जाता है। ये कविताएं इन मनोभावों का सिद्दत से अहसास कराती हैं। कवि का मानना सही है कि सच्चा प्रेम कवितातीत होता है। प्रेम के कवितातीत होने का प्रमाण ही है कि कविता के आदि से अब तक प्रेम पर हजारों -हजार काव्य ग्रंथ लिखे जा चुके हैं फिर भी प्रेम-कविता की मौलिकता बनी हुई है। अभी भी लगता है कि उसमें बहुत कुछ अनकहा ही रह गया है। कवि जब यह कहता है कि षब्द जितना कहते हैं उससे ज्यादा छिपाते हैं तब वह प्रेम की इसी विषिष्टता की ओर संकेत करता है। चूमने में षामिल सिर्फ देह ही नहीं होती कहकर कवि यह कह देता है कि प्रेम में तो पूरा षरीर और मन ही बोलता है जिसको षब्दों में समेट पाना मुष्किल है। वास्तव में कविता में प्रेम पूरा-पूरा उसी रूप में नहीं आ सकता है जैसा जीवन में होता है। क्या खूब कहा है प्रदीप ने -विस्थापित षिविर ही तो होती है -हर प्रेम कविता। विस्थापित षिविर में कोई भी व्यक्ति उस जीवन को नहीं पा सकता है जैसा अपने जल-जंगल-जमीन के बीच रहते हुए उसने जीया। इन कविताओं में आए बिंब प्रेम की तरह ताजगी लिए हुए तथा सुगठित हैं। भाव पूरी काव्यात्मकता लिए हुए हैं। ये कविताएं उस कली की तरह हैं जो अभी न तो पूरी खुली हैं और न ही बंद।ये सारी बातें प्रदीप भाई में एक समर्थ कवि की संभावना के प्रति आष्वस्त करती हैं। इन कविताओं के लिए प्रदीप भाई बधाई और अर्पणा जी साधुवाद की पात्र हैं।

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  7. 'प्यार' पर इतनी सारी कविताएं, एक साथ. एक धागे से जुड़ीं, पर कथ्य का स्वर बदलते ही, मुहावरे में भिन्नता लिए हुए. प्यार यहां व्यक्त हो भी रहा है कितने नए-नए अंदाज़ों में ! महेश ने बहुत कुछ कह दिया है इन कविताओं के बारे में, जिससे अलग हट कर कुछ कह पाना सरल भी नहीं रह गया है. यह सच है कि इस प्यार की व्याप्ति इतनी अधिक है कि ज़बान पर चढ़ा इसका अंग्रेज़ी पर्याय बहुत छोटा लगता है. मुझे ध्यान नहीं पड़ता कि इससे पहले प्रदीप सैनी की कोई कविता पढ़ी हो मैंने. अच्छा लगा है इन बहु-तलीय प्रेम कविताओं से गुज़रना. संभावनाओं के बारे में आश्वस्तिपूर्वक तब कुछ कहा जा सकता है, जब अन्य भाव-भूमियों पर उनकी कविताएं सामने आएं. सिर्फ़ प्रेम के सहारे जीवन और जगत के बारे में उनकी दृष्टि का अंदाज़ लगा पाना मेरे जैसे व्यक्ति के लिए आसान नहीं हैं. बधाई के हक़दार प्रदीप सैनी फिर भी हैं ही.

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  8. आप सब ने इन कवितायों को पढ़ा और सराहा .......... शुक्रिया...........सच कहूँ तो अपनी कवितायों को आपका स्नेह मिलने पर बहुत अच्छा महसूस कर रहा हूँ |

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  9. प्रेम पर लिखी बहुत अच्छी कविताएं। सचमुच इस कवि ने बहुत प्रभावित किया। आभार...प्रदीप भाई आपको बहुत-बहुत बधाई.....

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  10. शब्द कहते हैं जितना
    छिपाते हैं उससे अधिक
    वे छल के सबसे धारदार हथियार हैं
    .....कमाल की कविताएं.....ऐसी बात मेरे साथ ही नही....काफ़ि मित्रों के साथ होगी..कि....लम्बे अरसे बाद पढ़ी हैं...ऐसी पंक्तियां...! आभार.

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  11. सचमुच बड़ी अच्छी कविताएँ हैं। प्रेम कविताएँ हिन्दी में आजकल सिर्फ़ कवयित्रियाँ ही लिख रही हैं। युवा कवियों को पता नहीं क्यों कविता में प्रेम को अभिव्यक्त करना उचित नहीं लगता। लेकिन प्रदीप की ये कविताएँ पढ़कर मन आश्वस्त हुआ है। प्रदीप जी को मेरी शुभकामनाएँ।

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  12. सचमुच बड़ी अच्छी कविताएँ हैं। ये कविताएँ पढ़कर मन आश्वस्त हुआ है। मेरी शुभकामनाएँ।

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  13. tumhari kavitaon mein aur gulzar saab ke geeton mein ye smanta hai ki har bar padne ke baad...sunne ke baad ek baar fir padne ki lalak bani rehti hai aur har baar ..rehman saab ki dhuno ki tarah...kuch na kuch naya mil jaata hai..

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  14. Badmaashiyon ko
    Naye-naye andaaz se
    Chhipaane
    Ughaadne
    Aur
    Apne hi hathon
    Pachhadne waali
    Matwaali kavitaayen...

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  15. भाई प्रदीप सैनी की कविताओं को पढ़ना उस नदी को ध्‍यान से देखना है जो अपने बहने में बहुत कुछ सुनाती है। इन प्रेम विषयक कविताओं में प्रेम की अभिव्‍यक्ति और उसकी परिभाषाएं एकदम ताजा और जमीन से जुड़ी हैं। ग़ज़ब भाई। रुमानियत में होश-ओ-हवास इस कद्र केंद्रित है कि आप लंबे समय तक कविता से बाहर नहीं आ सकते। ये कविताएं जंगली फूल की तरह कथित आधुनिकता की खाद से दूर हैं, इसीलिए आकर्षित भी करती हैं। सच कहूं...प्रदीप मैं फैन हूं यार तुम्‍हारा।

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