विपिन चौधरी::



 























दुनिया  यूँ गायब हुई

पहले पहल फूल आये धरती पर
फिर चहचहाते पक्षी आये
फिर कछुओं की आवाजें सुनाई पडने लगी
धीरे धीरे अंगूरों की थैली में रस भरने लगा

एक वक़्त के बाद दिन के
दो टुकडे हुये
परछाईयाँ  उड़ान भरने की हिम्मत करने  लगी
हरियाले बगीचे को घेर लिया झींगुर, टटहरियों की आवाजाही की उधेड़बुन ने
येरुशेलम  में  पहले  मंदिर में
मीठी  घंटियाँ एक सी बोली बोलने  लगी

फिर दुनिया गोल हुई
इसके मिलनसार रास्ते एक के भीतर इस राह पाने लगे 

एक अजनबी राह में
तुमसे मिली मैं

और फिर  शिद्दत से बनी हुई ये
दुनिया सिर समेत गायब हो गयी.
 
इस योनी में मैं

सभी योनियों में अपने भाग्य पर इतराने के कई कारण थे
सभी तेतीस  करोड़ योनियों में
मैं यम की मजबूत  निगेहबानी में थी

ब्रह्मा, विष्णु, महेश मेरे अगल बगल ही टहल रहे थे
तीनों देवियाँ मुझ पर अथाह मेहरबान हुआ करती थी
उसी लक्ष्मी ने धन की ललक थमाई
सरस्वती ने ज्ञान का दर्प दिया
पार्वती ने साहस की सीनाजोरी

चारों पहर की तफरी के लिये
हाथ बांधे खडी थी
मेनका, उर्वशी, रम्भा और तिल्लोत्मा सी मोहक अप्सराएं


नारद हंसोड़ दूत सा इधर उधर की खबरे ला
मेरे भारी मौसम को हल्का किया करता था
विष्णु के दसों अवतारों से अच्छा खासा परिचय हुआ करता था

योनियों की परिक्रमा कर मनुष्य योनी  तक
पहुंचते न पहुँचते
सभी  सरमायेदार एक- एक कर साथ छोडते गए
सबको अपनी व्यस्ताओं का तकाज़ा था

तीनों देवियाँ अपने  पतियों की सेवा टहल में मुस्तैद हो गयी
चारों अप्सराओं पर गृहस्थी का दबाव बढ़ गया
दसों अवतारों ने हिमालय की ओर रुख कर लिया

रह गयी मैं निपट अकेली
महुष्य योनी का भार ढ़ोने और 
किसी दूसरी बेहतर योनी में टापने की प्रबल उत्कंठा के साथ


जुगलबंदी

कहते है कि पीछे के दिनों में जाना बुरा होता है
और उसकी बालू रेत में देर तक कुछ खोजते रहना  तो और भी बुरा
पर कोई बताये तो 
पुराने दिनों के धार की
थाह पाये बिना
भविष्य की आँख में काज़ल कैसे लगाई जाये

एक ड़ोर -टूटी पतंग तब तब
अतीत की मुंडेर पर फड़फडाने लगती है
तो आज के ताज़ा पलों का जीना भी हराम हो जाता है
अब हराम की जुगाली कोई कैसे करे 

मेरे मन के अब  दो पाँव हो गए हैं
एक पाँव अतीत की चहलकदमी करता है
दूसरा वर्तमान की धूल में धूसरित



भीतर जीवन



पौधे अपनी टहनियों के बल खड़े हो
धरती का खनिज सोख रहे थे

प्रेम,आत्मा के बूते 
मुखर हो रहा था

डोल्फिन पानी के भीतर-बाहर
आ-जा कर प्राणवायु को लपकते दोहरी हुई जा रही थी


सीधे-सीधे कोई नहीं कह पा रहा था
उसे जीवन 'भीतर जीवन जीवन' की तलाश है

जरूरी चीज़ें

धावकों के पांवों के उँगलियों के बीच
उगी 'फफूंद'
जरूरी है
जीत जितनी ही 

लोकतन्त्र के लिए सफेदपोश 'मसखरे'
जरूरी है

जीवन के लिए
हवा-आग-पानी में बजबजाते 'अणु'

प्रेम के लिये स्नेह में पंगी 'आत्मा'

लोहे का लहू सटकने के लिए जंग की लपलपाती 'जीभ'

जरुरी है बंद अलमारी में जमी 'धूल'
सुरक्षित आस्थाओं के लिये

पसीने की गंध
'देह की पहचान' के लिये 

जिस तरह जरूरी है कतरे के लिए जरूरी है 'आंख'

उसी तरह जरूरी है मिटटी की सेहत के लिए 'नमी'

पर अंतिम घड़ी तक यह तय नहीं हो पाया है 
कितनी जरूरी हूं 'मैं'
तुम्हारे लिए



दीवार पर कूची चलाते  हुए

क्या जब शरीर काम करता है तो
मन भी काम करता जाता   है

या शरीर  मन के हिस्से  की उर्जा को  सोख लेता है
या शरीर अपना काम करता है
और मन अपना
क्या शरीर मन से कदम ताल मिला पता है


क्या हमारे हाथों में थामी हुई  सुविधा
भीतर कोई हलचल पैदा करती है
या सुविधा विचारों की उफान को मंद कर देती है 

जब धब्बे साफ़ होते है
तो क्या मन की एक मैली लकीर भी साफ़ होने में सफल हो जाती  है


ये सारे विचार उस वक़्त अपना जिस्म ओढते हैं 
जब मैं  पुरानी मटमैली  दीवार पर आसमनी रंग पोत रही हूँ


ढेर सारे प्रश्नों के उत्तर तो नहीं मिल सके हैं पर
इसी  बीच पूरी की पूरी दीवार की कलई  छुप  गयी है
और खिली हुई 
आसमानी दीवार
मेरे ठीक सामने
मीठी- रंगीन हंसी हंस रही  है



प्रेम का यह आगंतुक  रूप

कविता
प्रेम का सबसे एकान्तिक दुःख है

जिस तरह दूरियां
यादों का पंचनामा हैं

लो अलगाव का एक और पक्षी
पंख फड़फडाते  हुए  मेरे आंगन में उतर आया  हैं

सारे काम काज को छोड़ मैं 
अपनी बालकनी में निकल आई  हूँ
उसे दाने डालने

सुनती आई हूँ
प्रेम कहीं  जाता नहीं
रूप बदल बदल कर
फिर- फिर जीवन में
आ धमकता है

कहीं आँगन में उतरा पक्षी भी प्रेम का ..............


अब  क्या  हो

एक तिलस्मी पल  की नोक पर
मेरा आमना-सामना प्रेम से हुआ
उजला -सफ़ेद- मृदुल प्रेम-चिरपरिचित प्रेम 

मेरी नज़र पड़ते ही   
वह शरमा दिया
ओह

मैं प्रेम की रुपहली आँखों में
रुस्तमी ख्वाबों  के बेल - बूटे टांक देना चाहती हूँ 
पर प्रेम ने  अपनी आंखें अधखुली रख छोड़ी हैं

मैं उसे आवाज देना चाहती हूँ तो वह
गली के उस पार जा चुका होता हैं

मैं उसके छूना चाहती हूँ
तो वह हवा होता है

उसे
अपने  भीतर समेटना चाहती हूँ  
तो वह शिला होता है

अब
मैं अपनी भाषा में गुम
और प्रेम अपनी लिपि में लोप 

24 टिप्‍पणियां:

  1. बधाई ..इन कविताओं की मृदुलता ध्यान खींचती है... यह विपिन की कविताओं में नया अनुभव है..

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  2. विपिन ने इस बार मिथकीय संदर्भों, अतीत से जुड़ी स्‍मृतियों और हमारे उलझे वर्तमान को लेकर अपनी आत्‍मीय शैली में बहुत जरूरी सवाल उठाए हैं, ये कविताएं थोड़े में बहुत कुछ कहती हैं और कहने से ज्‍यादा महसूस करने पर बल देती हैं। इतनी अच्‍छी कविताओं के लिए विपिन को बधाई और शुभकामनाएं। अपर्णा को आभार कि इतनी अच्‍छी कविताएं उपलब्‍ध करवाईं।

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  3. विपिन हर बार नए अंदाज़ में सामने आती हैं, मिथकों का सुंदर प्रयोग अच्छा लगा, यकीनन सुंदर कवितायेँ.......बधाई विपिन......

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  4. लीना मल्होत्रा राव6 जून 2012 को 10:09 pm

    भविष्य की आँख में काजल कैसे लगे जाए.. विपिन की कविताओं में जो बात मुझे बहुत प्रभावित करती है वह है विषय की विविधता.. वह कभी दस्यु सुन्दरी पर कविता लिखती हैं तो कभी मनुष्य योनी की वीरानगी पर.. उन्हें पढ़ना हमेशा सुखद है.. विपिन को हार्दिक बधाई और अपर्णा के फूल और खिलें इन्ही शुभकामनाओं के साथ..

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  5. बेहतर कविताएँ. बारिक और विविधता भरी. बधाई

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  6. कल 08/06/2012 को आपकी यह पोस्ट http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
    धन्यवाद!

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  7. पहली कविता बहुत अच्छी लगी . ये बिम्ब विधान और यह अंविति अद्भुत है और इधर की हिन्दी कविता मे दुर्लभ है . बधाई. मै अपनी एक कविता शेयर करना चाहूँगा :

    http://www.kavitakosh.org/kk/index.php?title=%E0%A4%9C%E0%A5%8B_%E0%A4%85%E0%A4%A8%E0%A5%8D%E0%A4%A7%E0%A5%8B%E0%A4%82_%E0%A4%95%E0%A5%80_%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%AE%E0%A5%83%E0%A4%A4%E0%A4%BF_%E0%A4%AE%E0%A5%87%E0%A4%82_%E0%A4%A8%E0%A4%B9%E0%A5%80%E0%A4%82_%E0%A4%B9%E0%A5%88_/_%E0%A4%85%E0%A4%9C%E0%A5%87%E0%A4%AF

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  8. ओ.....लिंक नही बना . कविता ही पेस्ट किए देता हूँ:

    जो अन्धों की स्मृति मे नहीं था
    ---------------------

    हमें याद है
    हम तब भी यहीं थे
    जब ये पहाड़ नहीं थे
    फिर ये पहाड़ यहाँ खड़े हुए
    फिर हम ने उन पर चढ़ना सीखा
    और उन पर सुन्दर बस्तियाँ बसाईं ।

    भूख हमे तब भी लगती थी
    जब ये चूल्हे नहीं थे
    फिर हम ने आकाश से आग को उतारा
    और स्वादिष्ट पकवान बनाए

    ऐसी ही हँसी आती थी
    जब कोई विदूषक नहीं जन्मा था
    तब भी नाचते और गाते थे
    फिर हम ने शब्द इकट्ठे किए
    उन्हे दर्ज करना सीखा
    और ख़ूबसूरत कविताएँ रचीं

    प्यार भी हम ऐसे ही करते थे
    यही खुमारी होती थी
    लेकिन हमारे सपनों मे शहर नहीं था
    और हमारी नींद में शोर .....
    ज़िन्दा हथेलियाँ होती थीं
    ज़िन्दा ही त्वचाएँ

    फिर पता नहीं क्या हुआ था
    अचानक हमने अपना वह स्पर्श खो दिया
    और फिर धीरे धीरे दृष्टि भी !

    बिल्कुल याद नहीं पड़ता
    क्या हुआ था ?

    ’केलंग, 27.08.2010

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  9. अचूक

    लगता है डर जिनको,
    चढ़ते सूरज से,
    करते है कोशिश वो ,
    ढांपने की उसको,
    ... मुह से निकट धुएं से,
    भूल जाते है,
    तम कभी जीता नहीं,
    उजाले से ।


    साहस मोहताज नहीं,
    किसी चाबी का,
    आत्म मंथन से,
    पहचान ख़ुद को,
    नहीं मरीचिका को देख,
    लक्ष्य भेद,
    यही कर्म है ,
    सार जीवन का ।


    फूल भी मिल जायेंगे,
    पर काँटों को पहचान,
    आस्था रख ख़ुद पर,
    लक्ष्य को पहचान,
    वार कर अचूक,
    पायेगा सब कुछ,
    अगर विश्वास है स्वयं पर ।
    http://pkvermaspoems.blogspot.in/2009/01/blog-post.html#!/2009/01/blog-post.html

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  10. आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा कल शुक्रवार के चर्चा मंच पर भी लगाई जा रही है!
    सूचनार्थ!

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  11. भाव का दायरा उस स्तर तक जब पँहुच जाये जहाँ हम हैं और वो भाव ..उससे उत्पन्न रचना वास्तव में अनूठी होती है .......ऐसी ही रचनाएँ आज विपिन जी यहाँ पढ़ने को मिली ..........शुक्रिया आपका भी अपर्णा दी !

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  12. विपिन की कवितायें इधर कई ब्लॉगों पर लगातार पढने को मिली हैं ...| उनके पास कथ्य तो महत्वपूर्ण है ही , शिल्प और संवेदना भी गजब की है | हमारी शुभकामनाये

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  13. शायद दूसरी कविताओं के लिए मैं फिर कभी आउंगी..अभी पहली के आगे जाने का मन नहीं कर रहा..
    इनकी पहली कविता ने मुझे भीतर तक भर दिया..
    मैं इसे बार-बार पढ़ूंगी..
    ये पहली कविता ..!
    बहुत दिनों के बाद मुझे किसी ने भीतर तक भर दिया.
    इन तक मेरा प्रेम पहुंचे.

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  14. कथ्यों की स्लेट पर प्रयोगधर्मी बिम्ब एवं शिल्प स्थापत्य की सशक्त कविताएं ... बधाई विपिन जी ...

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  15. mai to phele he kahta tha ki kucha khas hai vipin ki kavita maan ki aah ko chune wali hai

    bipin sharma

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  16. विपिन की अपनी एक दुनिया है. नितांत निजी और फिर भी सार्वजनिक. उसकी दुनिया में प्रवेश आपको अचंभित करता है. उसे छूते डर लगता है और उसके खिलंदड़ी सपनों के साथ आप एकमेक होते हुए भी एकमेक नहीं हो पाते कि वह उसका नितांत निजीपन है. उससे बस एक शिकायत अब सार्वजनिक करने का वक़्त है कि इस खूबसूरत भाषा और प्यारे शिल्प के साथ वर्तनी की अशुद्धियाँ बिलकुल नहीं फबतीं...सुधारों यार...तफरी नहीं तफरीह करो :)

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  17. i think some of Vipin's poems can be used for therapy!which one's? Can anybody help me to collect them?

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  18. I think some of Vipin's poems can be used as therapy!!!!!Which one's can anybody help me to collect them?

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  19. Treatment of the poem's subject is great in these poems. great works - pradeep jilwane

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  20. amazing expessions......................................cpsrivastava.9@gmail.com

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