माया एंजलो:: विपिन









समय पृथ्वी की सबसे बड़ी छलनी है जिसमें हमारी संततियों के लिए स्मृतियों की चाबियाँ बची रह जाती हैं। न जाने किस चाबी से कौनसा ताला खुल जाए ; कि कोई राह बने; कि कोई आकाश दिखे जिसमें असंख्य कड़वे पेंचदार  झूठों के बीच कुछ 'नाम' अपनी ताकत के साथ हमारी जीवन-शक्ति में जुड़ जाएँ।

 कि जब तुम कीचड़ में किसी नाम को धकेल रहे हो; तुम्हारी कोशिशें हो कुचल देने की...तब वह ताकतवर नाम धूल बन ऊपर उठे.… उठे आंधी कि दुनिया देखे। 

माया एंजलो की 22 कविताओं का अनुवाद विपिन ने किया है। पूरी संभाल के साथ ये कविताएँ 'मैं रोज़ उदित होती हूँ' (माया एंजलो की जीवनी ) में संकलित हैं। माया संघर्ष और प्रेम को जीने वाली कवि हैं। उनकी पांच प्रेम कविताओं के अनुवाद मैं यहाँ दे रही हूँ। 


विपिन के अनुवाद धरोहर हैं। 




गुज़रा समय

भोर सी तुम्हारी देह
मैं जैसे साँझ की कालिमा
एक,
जैसे किसी निश्चित अंत की शुरुआत
दूसरा
जैसे शुरुआती अंत




एक ख्याल

मुझे दो अपना हाथ
कविता के इस दायरे से बाहर
मेरे लिए इतनी जगह बना दो
ताकि
मैं तुम्हारा अनुसरण कर सकूँ


मर्मस्पर्शी शब्दों की निजता
और प्रेम के खोने से प्रेम की भावना को
दूसरों के लिए छोड़ दो

अपना हाथ मुझे सौंप दो





 इंकार 



प्रियतम
क्या किसी 
दूसरे जीवन या भूमि में


 तुम्हारे होठों, तुम्हारे हाथों,

तुम्हारी निडर और आकस्मिक हंसी
और उन मीठी ज्यादतियों के बारे में जान पाऊँगी जिन्हें मैं पसंद करती हूँ




हमारे मिलने की क्या संभावनायें हैं ?
बिना तय भविष्य में हम
किसी दूसरी दुनिया में हम फिर मिलेंगे,




मैं अपने शरीर को किसी भुलावे में नहीं रख सकती
एक बार फिर मैं
एक और मधुर मुलाकात के बिना
मृत्यु के लिये भी मैं
 आगे कदम नहीं रखूंगी






 जब तुम आते हो

जब तुम मेरे पास आते हो
अनामंत्रित

मुझे

लंबे समय तक कमरे में धकेल देते हो
जहाँ 
स्मृतियाँ  बैठी हुयी  हैं


पेश करते हो
बच्चे को जैसे सौंपी हो अटारी,
कुछ दिनों के समारोह
चोरी के चुंबन सी तुच्छ चीज़
उधार दे प्रेम का गहना
गुप्त शब्दों के लोहे की पेटी
और मैं रोती हूँ


 वसूली


पुराना प्रेम
जो अपने निष्कर्ष में सही है,
उसके पंखों को काट देना  चाहिए
क्योंकि आगे उड़ान की मनाही है
लेकिन अब मैं जानती हूँ ,
कि अब यह भ्रम
ऊपर उठा रहा है
और प्रकाश की ओर तेजी से फैलता जा रहा है




2 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सहज अनुवाद किया है विपिन ने ..
    बधाई आप दोनों को ...

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  2. इन कविताओं में यथार्थ की खुरदुरी सतह पर भी प्रेम ठहरा हुआ है. और यही खुरदुरापन प्रेम को चलने में समर्थ बनाता सा भी प्रतीत होता है. माया जी को श्रद्धांजलि. विपिन जी को बधाई सुन्दर अनुवाद के लिए और अपर्णा जी आपका शुक्रिया प्रस्तुति के लिए.

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