नंद भारद्वाज ::
















हर बार

हर बार
शब्द होठों पर आकर लौट जाते हैं
कितने निर्जीव और अर्थहीन हो उठते हैं
हमारे आपसी सम्बन्ध,
एक ठण्डा मौन जमने लगता है
हमारी सांसों में
और बेजान-सी लगने लगती हैं
आंखों की पुतलियां !

कितनी उदास और
अनमनी हो उठती हो तुम एकाएक
कितनी भाव-शून्य अपने एकान्त में,

हमने जब भी आंगन से बात उठाई
चीजों को टकराकर टूटने से
रोक नहीं पाए
न तुम अपने खोने का कारण जान सकी
न मैं अपनी नाकामी का आधार !

तुम्हें खुश देखने की ख्वाहिश में
मैं दिन-रात उसी जंगल में जूझता रहा
और तुम घर में ऊबती रही लगातार
गुजरते हुए वक्त के साथ
तुम्हारे सवाल और शिकायतें बढ़ती रहीं
और मैं खोता रहा हर बार
अपने शब्दों की सामर्थ्य में विश्वास  !


खोज ली पृथ्वी

तुम्हारे सपनों में बरसता धारोधार
प्यासी धरती का काला मेघ होता

लौट कर आता
रेतीले टीलों के मंझधार
तुम्हारी जागती इच्छा में सपने आंजता

अब तो चिन्दी चिन्दी बिखर गया है
लौटता उल्लास
और मन्दी पड़ती जा रही है
उस चूड़े की मजीठ
जिसकी रंगत
बरसों खिलती रही
हमारे पोरों में
पर इसी जोम में खटते आखी उम्र
हमने आकाश और पाताल के बीच
आखिर खोज ली पृथ्वी !



उसकी स्मृतियों में

जिस वक्त में यहाँ होता हूँ
तुम्हारी आँख में
कहीं और भी तो जी रहा होता हूँ
किसी की स्मृतियों में शेष
शायद वहीं से आती है मुझमें ऊर्जा
इस थका देने वाली जीवन–यात्रा में
फिर से नया उल्लास
एक सघन आवेग की तरह
आती है वह मेरे उलझे हुए संसार में
और सुगंध की तरह
समा जाती है समय की संधियों में मौन
मुझे राग और रिश्तों के
नये आशय समझाती हुई।

उसकी अगुवाई में तैरते हैं अनगिनत सपने
सुनहरी कल्पनाओं का अटूट एक सिलसिला
वह आती है इस रूखे संसार में
फूलों से लदी घाटियों की स्मृतियों के साथ
और बरसाती नदी की तरह फैल जाती है
समूचे ताल में

उसी की निश्छल हँसी में चमकते हैं
चाँद और सितारे आखी रात
रेतीले धोरों पर उगते सूरज का आलोक
वह विचरती है रेतीली गठानों पर निरावेग

उमड़ती हुई घटाओं के अन्तराल में गूँजता है
लहराते मोरों का एकलगान
मन की उमंगों में थिरक उठती है वह
नन्हीं बूँदों की ताल पर।

उसकी छवियों में उभर आता है
भीगी हुई धरती का उर्वर आवेग
वह आँधी की तरह घुल जाती है
मेह के चौतरफा विस्तार में

मेरी स्मृतियों में
देर तक रहता है उसके होने का अहसास
सहेज कर जीना है
उसकी ऊर्जा को अनवरत।


मैं जो एक दिन

मैं जो एक दिन
तुम्हारी अधखिली मुस्कान पर रीझा,
अपनों की जीवारी और जान की खातिर
तुम्हारी आंखों में वह उमड़ता आवेग -
मैं रीझा तुम्हारी उजली उड़ान पर
जो बरसों पीछा करती रही -
अपनों के बिखरते संसार का,

तुम्हारी वत्सल छवियों में
छलकता वह नेह का दरिया
बच्चों की बदलती दुनिया में
तुम्हारे होने का विस्मय
मैं रीझा तुम्हारी भीतरी चमक
और ऊर्जा के उनवान पर
जैसे कोई चांद पर मोहित होता है -
कोई चाहता है -
नदी की लहरों को
बांध लेना बाहों में !


तुम्हारा होना

तुम्हारे साथ
बीते समय की स्मृतियों को जीते
कुछ इस तरह बिलमा रहता हूं
अपने आप में,
जिस तरह दरख्त अपने पूरे आकार
और अदीठ जड़ों के सहारे
बना रहता है धरती की कोख में ।

जिस तरह
मौसम की पहली बारिश के बाद
बदल जाती है
धरती और आसमान की रंगत
ऋतुओं के पार
बनी रहती है नमी
तुम्हारी आंख में -
इस घनी आबादी वाले उजाड़ में
ऐसे ही लौट कर आती
तुम्हारी अनगिनत यादें -

अचरज करता हूं
तुम्हारा होना
कितना कुछ जीता है मुझ में
इस तरह !

12 टिप्‍पणियां:

  1. Hamesha ki tarsh...bejod, sunder aur..mook abhivyakti ki awaaz!!...

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  2. अपर्णा बहन दिल से मुबारकबाद और ढेरों दुआएं.
    आदत से मजबूर हूँ कि बिना पड़े (सच वाला पड़ना) कमेन्ट ना कभी कर पाया ना ही करने का कोई इरादा है...
    अभी पढ़ी एक रचना , और उसमे ही रच के रह गया इतना कि अगली पढ़ी तो शायद "हर बार" के साथ अन्यायपूर्ण होगा...
    श्री नंद भारद्वाज को मेरा साधुवाद कि उन्होंने उस रिश्ते को जो रिस रहा है तिल तिल के इतनी बखूबी बयाँ कर दिया, मेरी शुभ कामनाएं उन तक अवश्य पहुँचा देना बहन ...

    क्रमशः...

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  3. अपर्णा सबसे पहले आपको इतना खूबसूरत ब्लॉग बनाने के लिए बधाई देना चाहूंगी ...बड़े सुगन्धित फूलो से महक रहा हे यह ब्लॉग ,अभी तो शुरुआत हे इस गुलशन की शोभा तो बढती ही जायेगी ....
    आदरनीय नन्द जी की रचनाओ में स्मृतियों प्रेम की सुखात्मक अनुभूति प्रदान कर रही हे ...
    कितना सच कहा ही उन्होंने .."थका देने वाली जीवन–यात्रा में
    फिर से नया उल्लास
    एक सघन आवेग की तरह
    आती है वह मेरे उलझे हुए संसार में
    और सुगंध की तरह
    समा जाती है समय की संधियों में मौन
    मुझे राग और रिश्तों के
    नये आशय समझाती हुई।"
    एक अलग ही तरह की उर्जा समवित हो जाती हे जीवन में ..विशाल करुनासिक्त पृथ्वी पर जो गीत के फूल खिलते हे वो जीवन को हमेशा सुरभित करते हे ... बहुत बहुत बधाई हो

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  5. अपर्णा जी!
    हार्दिक शुभकामनाएँ, एक ऐसे ब्लॉग के लिए जो प्रेम को समर्पित है.
    बहुत ही सुन्दर व भावपूर्ण रचनाएँ हैं,आदरणीय नन्द जी को पढना सुखकर लगा. उन्हें हार्दिक आभार!

    आपसे एक विनय है,यदि हो सके तो एक-एक कर रचनाएँ प्रस्तुत करें. ताकि उसका पूर्ण रसास्वादन किया जा सके...
    -सादर, सविनय.

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  6. तुम्हारे साथ
    बीते समय की स्मृतियों को जीते
    कुछ इस तरह बिलमा रहता हूं
    अपने आप में,
    जिस तरह दरख्त अपने पूरे आकार
    और अदीठ जड़ों के सहारे
    बना रहता है धरती की कोख में
    kitni sundar panktiyan hain. Badhai Nand ji. - Manisha kulshreshtha

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  7. सुमन केशरी27 फ़रवरी 2011 को 11:18 pm

    नंद जी की कविताएं -सुदंर बात सुदंर ढंग से..कभी उदास करती तो संवाद करती...

    और अपर्णा को इतनी सुंदर और भावपूर्ण पत्रिका निकालने के लिए बधाई

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  8. प्रेम पर जितना लिखा जाये कम ही है ,
    और जब भी लिखा जाये नया ही लगता है !
    बहुत सुन्दर रचनाये है नन्द जी की ,
    मौलिक और अनूठी !
    सुन्दर ब्लाग के लिए बधाई !

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  9. हरी दूब का सपना में ये कविताएँ पढ़ीं थीं। पुन: पढ़ीं और पावन-प्रेम और श्रेष्‍ठ काव्य की रस-धारा में खो सी गई ! कहानी हो या कविता नंद सर भावना की गहराई में उतरते हैं और पाठक भी उस गहराई में सानंद विचरण करता है।
    बेहतरीन पत्रिका/चिट्‍ठे के लिए बधाई अपर्णा जी और इन कविताओं को पुन: पढ़वाने के लिए शुक्रिया।

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  10. जीवन के मानवीय अनुभवों से सरोबार हृदयंगम भावनाओं केसाथ गुनगनाती शब्दों की फुहार..... नंद सर को जन्म दिन की ढेर सारी बधाई....निर्मल पानेरी

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  11. दाम्पत्य के पल पल बनते बिगड़ते रिश्तों का सूक्ष्म चित्रण.कल्पना और यथार्थ के बीच झूलता मनुष्य सीमित उडान भरने और अपनी सीमायें स्वीकार करने के लिए अभिशप्त है.

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  12. aadarniy Aparna di ... ye kavitaaye maine idhar udhar padhi thee alag alag ... aaj inhen aik saath padha .. jiwan aur aapsee sanvadon aur bhavnaaon se jhunjhti ye rachnaye apne me bahut kuch samete hue hain .. Sadar

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