मनीषा कुलश्रेष्ठ ::





















देह – नद::


1.

नदी उमड़ती है
एक लहर ज्वार – सी
चाहती है छू लेना
उचक कर अपने चाँद को
प्रबल आकर्षण – प्रबल मोह
उसे उठाता है, एक ऊँचाई तक
फिर उसे गिरना होता है
अपनी ऊँचाईयों से
प्रपात बन
यूँ किसी का प्रेम में
उठ कर गिरना
बहुत मार्मिक है
और दुखद भी.


न गंगा, न कालिन्दी,
वोल्गा भी नहीं
जानती हूँ
मैं हूँ एक विलुप्त धार
सरस्वती की
भीतर कहीं अंतर्धारा - सी बहती
सबसे छिपा कर उठाती हूँ हलचलें
करती हूँ आग्रह कितने
छिपा लेते हो तुम भी प्रत्यक्षत:
सब कुछ


कभी - कभी उतर मुझमें
कहते हो -- सुन, मानिनी
तेरी तृष्णा का
आधा भाग मेरा
तू अकेली ही विकल नहीं
विलुप्त हो तुझमें
मैं भी तो अकुलाता हूँ
मैं स्वप्न तेरा.




2.


रात तुम उफनी थीं
उस मुहाने पर आ
जहाँ प्रकृति मिलाती है
तुम्हें मुझसे
मैं हतप्रभ समेटता रहा तुम्हें
नदी हो तुम
इसी मुहाने से होकर
प्राय: नि:शब्द मिलती आई हो
अपने इस समुद्र से
रात क्या
किसी पहाड़ी रास्ते से गुज़र कर
आई थीं तुम?






यूँ तुम हो::


यूँ तुम हो
एक संतुलित – सजग व्यक्ति
बहुत उदारमना
लोग प्रभावित होते हैं
और मैं गर्वित


मैं जानती हूँ
बहुत छिपाना पड़ता है तुम्हें
छोटे क्षुद्र भाव
ईर्ष्या, शंका, आक्रोश
बहुत सफलता से तुम छिपाते आए हो
कितना समझाते हो आँखों को
कि छिपा लें प्रेम भी / प्रशंसा भी
अब तक कहते आए हो - अतीत था
तुम्हारा अपना
वर्तमान है हमारा
और हो
तुम मेरी अपनी


मगर कभी – कभी
कर जाती हैं अवमानना
तुम्हारी चतुर – मुखर आँखें
पूछ ही लेती हैं...
अतीत से, कुछ गुस्ताख़ प्रश्न
रक्ताभ हो जाती हैं, ईर्ष्या से
मैं कुछ डर कर
कुछ हँस कर, सहेज लेती हूँ
स्नेह से अवश,
अधिकार की तीव्र भावना को
जानती हूँ
अगर है ईर्ष्या तो प्रेम तो होगा ही
यूँ तुम हो
एक संतुलित – सजग व्यक्ति






भविष्य आँकते – आँकते::


बरसातों को थाम कर
वह सृजन की बातें करता है
मैं कानों में बबूल के
पीले, गोल – मखमली फूल पहने
सुनती रहती हूँ
जल पाँखी का पंख लिए
वह गुदगुदाता है
मेरे ज़रा से उघड़े – खुले पैर
मैं खो रही हूँ..
उसकी जंगल – आँखों में
वह घने बरगद की
ज़मीन छूती शाख पर बैठा
आँक रहा है रिश्ते को
जंगल की फैली हथेलियों पर
रेखाओं सी पगडंडियाँ देख बता रहा है...
शून्य है हमारे प्रेम का भविष्य


मैं कान में बबूल के फूल पहने
पैर हिलाते सोच रही हूँ
कितना भी शून्य क्यों न हो
अब तक हमने जो रंग बटोरे हैं
क्या उतने काफी न होंगे
तुम्हारे - मेरे भविष्य के
बड़े शून्य को भरने को!

                                                                                        

12 टिप्‍पणियां:

  1. "अपनी ऊँचाईयों से
    प्रपात बन
    यूँ किसी का प्रेम में
    उठ कर गिरना
    बहुत मार्मिक है
    और दुखद भी."

    "अगर है ईर्ष्या तो प्रेम तो होगा ही"

    "कितना भी शून्य क्यों न हो
    अब तक हमने जो रंग बटोरे हैं
    क्या उतने काफी न होंगे
    तुम्हारे - मेरे भविष्य के
    बड़े शून्य को भरने को!"

    सत्यता को समेटे, सभी कविताएँ प्रेम की अंतरंग अनुभूतियों सी पावन हैं...
    नीलम जी, शुभकामनाएँ...

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  2. "मैं हूँ एक विलुप्त धार
    सरस्वती की
    भीतर कहीं अंतर्धारा - सी बहती"

    बहुत खूबसूरत बयानगी - काव्‍य-भाषा और भाव का ऐसा सुन्‍दर संयोजन बिरले ही मिलता है, आज की कविताओं में। प्रेम यों भी एक आदिम और पवित्र मानवीय भाव है, जो रचनाकार को भीतर से मांजकर बेहतर मनुष्‍य बनाता है। इन सुन्‍दर कविताओं के लिए बधाई।

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  3. बहुत ही खूबसूरत काव्यत्मक अभिव्यक्ति हे ...प्रेम का अद्भुद भाव ,मैं हूँ एक विलुप्त धार
    सरस्वती की
    भीतर कहीं अंतर्धारा - सी बहती"

    पढ़ना सुखद लगा ... शुभकामनाये

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  4. रात क्या
    किसी पहाड़ी रास्ते से गुज़र कर
    आई थीं तुम?

    प्रेम का आवेग और उसे संतुलित करने का कलात्मक भाषिक कौशल.
    आपको अपने किसी कविता संग्रह के बारे में भी सोचना चाहिए.

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  5. फिर उसे गिरना होता है
    अपनी ऊँचाईयों से
    प्रपात बन
    यूँ किसी का प्रेम में
    उठ कर गिरना
    बहुत मार्मिक है
    और दुखद भी.

    बहुत अच्छी कवितायेँ...

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  6. मनीषा , आप तो फेर गयीं सम्मोहिनी छड़ी ... अब तो संग्रह की प्रतीक्षा है...

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  7. एक कहानीकार की कवितायें पढ़ना सुखद है…

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  8. तेरी तृष्णा का
    आधा भाग मेरा
    तू अकेली ही विकल नहीं
    विलुप्त हो तुझमें
    मैं भी तो अकुलाता हूँ
    मैं स्वप्न तेरा.

    बहुत ही गहन अनुभूति है मनीषा जी

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  9. सुमन केशरी14 मार्च 2011 को 1:04 am

    सुमन केशरी

    रात तुम उफनी थीं
    उस मुहाने पर आ
    जहाँ प्रकृति मिलाती है
    तुम्हें मुझसे
    मैं हतप्रभ समेटता रहा तुम्हें
    नदी हो तुम
    इसी मुहाने से होकर
    प्राय: नि:शब्द मिलती आई हो
    अपने इस समुद्र से
    रात क्या
    किसी पहाड़ी रास्ते से गुज़र कर
    आई थीं तुम?

    सुंदर कविता....चित्रोपम..

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  10. कभी - कभी उतर मुझमें
    कहते हो -- सुन, मानिनी
    तेरी तृष्णा का
    आधा भाग मेरा
    तू अकेली ही विकल नहीं
    विलुप्त हो तुझमें
    मैं भी तो अकुलाता हूँ
    मैं स्वप्न तेरा.

    अधिकार की तीव्र भावना को
    जानती हूँ
    अगर है ईर्ष्या तो प्रेम तो होगा ही

    "कितना भी शून्य क्यों न हो
    अब तक हमने जो रंग बटोरे हैं
    क्या उतने काफी न होंगे
    तुम्हारे - मेरे भविष्य के
    बड़े शून्य को भरने को!".....
    गहरे भाव

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  11. यूँ किसी का प्रेम में
    उठ कर गिरना
    बहुत मार्मिक है
    और दुखद भी. ....वाह मनीषा....

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