शिरीष कुमार मौर्य

शिरीष कुमार मौर्य की कविताएं समकालीन कविता के परिसर में उन छोटी-छोटी स्मृतियों तक हमें ले जाती हैं जो हमसे उचटकर दूर चली गई हैं या जिन्हें बाज़ार ने हमसे छीन लिया है।  दस-बीस मौखटों में जीते हुए हम अपना चेहरा ही भुला बैठे हैं, ऐसे में ये कविताएं आपसे गर्मजोशी से हाथ मिलाती हैं और अपने भीतर के दोस्त से मिलवाती हैं।


'सब कुछ ले जाता है मुझे तुम तक
जैसे सब कुछ जो है -
खुशबुएँ ,रोशनी ,धातुएं
उनका बहना तुम तक जैसे छोटी-छोटी नाव
ऐसे जैसे
मेरे इंतज़ार में गोया  टापू तुम्हारे।' (पेब्लो नेरुदा )
कुछ ऐसी ही यात्रा करती कविताएं।

by Maureen Ida Farley









बेदर्दी बालमा को याद करने वाले दिल::
 
बेदर्दी बालमा को याद करने वाले दिल पहले समाज में होते थे
समाज से 60 के दशक की फिल्‍मों में गए फिर वापस समाज में लौटना भूल गए

साधना की सफ़ेद साड़ी में बिलखने और लता की उजली आवाज़ में चमकने वाले दिल वहीदा रहमान की सांवली सुन्‍दरता को सराहने वाले दिल
 

गली से गुज़रते किसी के मिल जाने पर
एक साथ खिल उठने और मुर्झा जाने वाले दिल

मेरे पिता के ज़माने के दिल वो नुकीले जूते पिता के तंग मुहरी की पतलूनें लम्‍ब्रेटा स्‍कूटर
वो पीछे मुड़े काले बाल
पिता के प्रेम मैं नहीं जानता मां जानता हूं

यह भी जानता हूं कि 65-70 में
नागपुर में पिता का हिस्‍लाप कालेज प्रेम से ख़ाली न रहा होगा

प्रेम जैसा अब भी बहुत कुछ है समाज में
कुछ अर्थों में पहले से बेहतर
पर उसमें साथ रहने की सम्‍भावनाएं अधिक हैं याद करने की कम

समाज ख़ुद अब एक याद जैसा समाज है पिता एक बूढ़े पिता हैं
दादा हैं पोते के साथ कुछ देर खेल लेते हैं बाज़ार जाकर सामान ले आते हैं

पेंशन का हिसाब रख लेते हैं

लेकिन चैन नहीं मेरे जवान दिल को
कोई प्रेम ही है
कि याद आते हैं विकट गोपनीय प्रेम करने वाले और याद करने वाले दिल
उजड़ जाने तबाह हो जाने वाले दिल
मेरे पैदा होने से बहुत पहले जवान हुए दिल मेरी जवानी में कहीं दूर बिला चुके दिल मेरे बुढ़ापे में वे मिथक-काव्‍य होंगे

मैं बेदर्दी बालमा तुझको मेरा मन याद करता है सुन सकता हूं
गा नहीं सकता
क्‍योंकि उन्‍हीं याद करने वाले पुराने दिलों की तरह किसी को व्‍याकुल बुला तो सकता हूं उतना ही आकुल किसी के पास जा नहीं सकता।






आज की बात जो मेरे अतीत से आती है::


पिछले साल मैं ग्‍यारहवीं में पढ़ने लगा था
और वो आठवीं में
उसने उपहार में समोसे मांगे थे हरी चटपटी चटनी के साथ

और मुझे दिया था एक नया सूती रूमाल

वह मेरे साथ-साथ रेल से भी प्‍यार करने लगी थी
चमचमाती पटरियां और उन पर से गुज़रती रेल उसे रोमांचित करती थीं मैं किसी स्‍टेशन पर किसी रेल से उतरता था
वो किसी स्‍टेशन पर किसी रेल में चढ़ती थी

पिछले साल ग्‍वारहवीं में पढ़ते हुए मैंने ख़ुद को पहाड़ी तेंदुआ महसूस किया था पिछले साल मैं ख़ुद पर और अपने आसपास पर ज़ोर से गुर्राया था
पिछले साल आठवीं में पढ़ते हुए उसने मेरी पीठ को प्‍यार से सहलाया था पिछले साल मैं वन में था

पिछले साल वो बताती थी मैं उसके मन में था

चालीस से तुरत पहले की उम्र में पन्‍द्रह-अट्ठाह बरस की दो उम्रें निकल आती थीं वो अपनी उम्र में से दो उम्रें निकाल लेती थी
मैं अपनी उम्र से दो उम्रें निकाल लेता था
हमारी आसन्‍न प्रौढ़ता दुबारा किशोर होने की

एक आत्‍मीय और प्रसन्‍न उम्‍मीद को जन्‍म देती थी हमारी स्‍मृति और कल्‍पना उर्वर थीं

ग्‍यारहवीं में पढ़ने लगना अजीब नहीं था आठवीं में पढ़ने लगना अजीब नहीं था

एक दिन ग्‍यारहवीं में पढ़ते हुए मैंने उसे एक रेल में बिठाया एक दिन आठवीं में पढ़ते हुए वह एक रेल में बैठी

प्‍लेटफॉर्म  पर मैं खड़ा रहा रेल में वह चली गई

मैंने उन्‍तालीस की उम्र में सोचा
कि प्रेम कुछ भी हो कद्दू की बेल नहीं हो सकता जिस पर फूल भले सुन्‍दर, पीले और नाज़ुक खिलें फल लेकिन कद्दू ही लगता है

वह चली गई
उसका चले जाना जारी रहा
बहुत दूर नहीं गई पर चले जाते रहने से अंतराल बढ़ गया उसे भूगोल में दूर नहीं जाना था समय में जाना था

जहां से वह गई समय का वह सिरा उसने दांत से काट दिया जैसे कभी बटन लगाने के बाद काटा था धागा
और धागे की वह रील मुझे फिर कभी नहीं मिली।





हाल-फ़िलहाल::

लालसाओं के मुख खुले ख़ून दिखा दांत दिखे

नाख़ून छुपे हुए आए पंजों से बाहर

रामपुरी की तरह हाथ तमंचा हुआ

दिल रहा नहीं
एक मशीन ही बची धमनियों में ख़ून फेंकने के वास्‍ते

शरीरों में बिलबिलाए कीड़े बाहर निकलते ही
दूसरी देह को खा जाते

आसपास के सड़ते दिमाग़ों की बदबू सांसों में आने लगी

अकबका कर जागा मैं बेशर्म नींद से

जागते रहने की कसम जो खाई थी बिला गई
बिना कुछ रचे नींद आ गई

अब एक दोपाया बचा है
काम पर जा रहा है काम से आ रहा है

कवि की कमाई है

एक अध्‍यापक खा रहा है।



सम्‍पर्क - दूसरा तल, ए-2, समर रेजीडेंसी, पालिका मैदान के पीछे,  भवाली, जिला-नैनीताल (उत्‍तराखंड) 263 132

8 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सुन्दर प्रस्तुति।
    पोस्ट को साझा करने के लिए आभार।

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  2. वास्तविकता के धरातल को शिरीष जी के अन्दर बैठा कवि बेहद भावुक होते हुए नहीं भूलता...प्रेम जैसे कुछ को भूलते जा रहे समय में ये कविताएँ धागे की उस रील को ढूढने निकली हैं जो इन्सान को इन्सान से बांधती है...यही कवि की कमाई है. सुन्दर कविताएँ पढवाने के लिए अपर्णा जी आपका आभार और शिरीष जी को साधुवाद...

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  3. शिरीष जी की कविताओं का फलक बहुत बड़ा है ... उनमे से ये तीन कवितायेँ ... जो कि कविता की यात्रा में एक पीड़ी पहले का प्रेम की पटकथा कहती हुई पुराने गीत के साथ पिता से जुडी स्मृतियों को संजोती हुई तो वही दुसरी में किशोर होते बच्चों में प्रेम की भावना को प्रदर्शित करती छोटी छोटी चीजें जैसे समोसों का चटपटा स्वाद, रेलगाडी की चमक और फिर कवि मन का उन यादो में वापस जाना ..... तीसरी कविता की आखिरी दो पंक्तियों ने यकायक रहस्य को तोड़ कर एक अलग जगह पाठक को खडा कर दिया ... अच्छी कवितायें ... अपर्णा धन्यवाद इन तक हमें पहुंचाने के लिए ..

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  4. फ्रेश कविताएँ .. खूब बारिश के बाद खिली हुई हल्की धूप जैसी कविताएँ ..बधाई आप दोनों को.

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  5. मैं यह ब्लॉग उन कविताओं के लिए खोलता हूँ जो *दूसरी* कविता जैसी होती हैं । मज़ा आया । प्यारी सच्ची असली कविता । अविस्मरणीय बिम्ब । उदात्त भाव । बहुत दिन बाद आँख नम हुई ।

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  6. प्रेम की बेल कद्दू की बेल नहीं हो सकती। वह इस कविता की तरह अमरबेल होती है...

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