विमलेश त्रिपाठी ::


























प्यार करते हुए


शब्दों से मसले हल करने वाले बहरूपिये समय में
मैं तुम्हें शब्दों में प्यार नहीं करूंगा

नीम अंधेरे में डूबे कमरे के रोशन छिद्र से
नहीं भेजूंगा वह खत
जिस पर अंकित होगा
पान के आकार का एक दिल
और एक वाक्य में
समाए होंगे सभ्यता के तमाम फलसफे
कि मैं तुम्हें प्यार करता हूं

मैं खड़ा रहूंगा अनंत प्रकाश वर्षों की यात्रा में
वहीं उसी खिड़की के समीप
जहां से तुम्हारे स्याह ज़ुल्फों के मेघ दिखते हैं
हवा के साथ तैरते-चलते
चुप और बेआवाज़

नहीं भेजूंगा हवा में लहराता कोई चुंबन
किसी अकेले पेड़ से
पालतू खरगोश के नरम रोएं से
या आइने से भी नहीं कहूंगा
कि कर रहा हूं मैं
सभ्यता का सबसे पवित्र
और सबसे खतरनाक कर्म...



स्कूल की डायरी से


तब देर रात गए एक पागल तान
अंधेरे के सांवर कपोलें पर फेनिल स्पर्श करती थीं
बसंती झकोरों में मदहोश एक-एक पत्तियां
लयबद्ध नाचती थीं
जंगल में बजते थे घुँघरू
चांद चला आता था तकिए के पास
कहने को कोई एक गोपनीय बात

नींद खुलती थी पूरबारी खिड़की से चलकर
सुबह का सूरज सहलाता था गर्म कानों को
और मां के पैरों का आलता
फैल जाता था झनझन पूरे आंगन में

तब पहली बार देखी थी मैंने
नदी की उजली देह
भर रही थी मेरी सांसों में
पहली बार ही
झंवराए खेतों की सोंधी-सोंधी हंसी

दरअसल वह ऐसा समय था
कि एक कविता मेरी मुट्ठी में धधकती थी
मैं भागता था
घर की देहरी से गांव के चौपाल तक
सौंपने के लिए
उसे एक मासूम-सी हथेली में

सूरज डूबता था
मैं दौड़ता था
रात होती थी
मैं दौड़ता था

अंततः हार कर थक गया बेतरह मैं
अपनी स्कूल की डायरी में लिखता था एक शब्द
और चेहरे पर उग आई लालटेन को
कांपते पन्नों में छुपा लेता था।


उस लड़की की हंसी



घर से दूर
इस यात्रा की थकान में
मेरे दुखों को सहलाती हुई तेरी हंसी

इस हंसी का

कर्ज़दार हुआ मैं

ले जाऊंगा इसे कोलकाता
और रख दूंगा
सहेजकर अपने बिस्तर के सिरहाने
कि रख दूंगा इसे
मां की आरती की थाल में
तुलसी के गमले के पास कहीं
और खड़ा हो जाऊंगा प्रार्थना की मुद्रा में

छूऊंगा इसे
अपने हारे हुए
और व्यथित क्षणों में

फिर कहता हूं
कर्जदार हुआ मैं तुम्हारा
कि कैसे चुकाऊंगा यह कर्ज
नहीं जानता

हां, फिलहाल यही करूंगा
कि कल तड़के घर से निकलूंगा
जाऊंगा उस औरत के घर
जो मेरे दो बच्चे की मां है
और पहली बार
निरखूंगा उसे एक बच्चे की नजर से

कहूंगा कि हे तुम औरत
तुम मेरी मां हो

और अपने छूटे हुए घर को
ले आऊंगा साथ अपने घऱ....।



तुम्हारा प्यार

तुम्हारा प्यार
बुरे  दिनों में आई
राहत की चिट्ठियां हैं

तुम्हारा प्यार
बसंत की गुनगुनी भोर में
किसी पेड़ की ओट से उठती
कोयल की बेतरह कूक है

तुम्हारा प्यार
लहलहाती गर्मी में
एक गुड़ की डली के साथ
एक ग्लास पानी है

16 टिप्‍पणियां:

  1. लीक से हट कर, विमलेश अपनी कविताओं में अलग से पहचाने जा सकते हैं. किन वजहों से, ये बता पाना तो मुश्किल है, मगर उनकी कविताएं ज़हन में बहुत देर तक ठहर जाती हैं, चाहे ’कविता से लंबी उदासी हो’या ’सभ्यता का सबसे खतरनाक कर्म’ हो......
    अच्छी कविताएं साझा करने के लिये आपका धन्यवाद और विमलेशजी को बधाई.

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  2. फिलहाल यही करूंगा
    कि कल तड़के घर से निकलूंगा
    जाऊंगा उस औरत के घर
    जो मेरे दो बच्चे की मां है
    और पहली बार
    निरखूंगा उसे एक बच्चे की नजर से

    कहूंगा कि हे तुम औरत
    तुम मेरी मां हो

    और अपने छूटे हुए घर को
    ले आऊंगा साथ अपने घऱ....।

    बहुत ही गहन और सुंदर अनुभूति है

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  3. ...आज के दौर में...जब प्रेम सिर्फ़ लफ़्ज़ों में बचा है...विमलेश जी उससे आगे की सोच के कवि हैं....संवेदना की छुअन से कविता को महकाने वाले...तभी तो कह देते हैं...मैं तुम्हें शब्दों में प्यार नहीं करूंगा....शुभकामनाएं

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  4. विमलेश जी की सभी रचनायें बहुत पसंद आयीं ..प्यार को देखने का एक अलग नजरिया ...पढवाने के लिए आभार

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  5. विमलेश जी कि हर रचना मे एक अजब आकर्षण है…………सोच दिल को छूती है।

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  6. विमलेश कहानी और कविता दोनों में अच्छा कर रहे हैं.अपर्णा के फूलों का सबको रंग भा रहा है. बधाई दोनों को.

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  7. apki kavitayen achhi lagi.. jaisa ki hamesha hota hai... bahut sundar

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  8. विमलेश जी..सभ्यता का सबसे पवित्र और सबसे खतरनाक कर्म..क्या बात है ..शब्दों में कैसी अजब सी कसक भरी सच्चाई है..शुभकामनायें..

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  9. सभ्यता का सबसे पवित्र
    और सबसे खतरनाक कर्म...
    !!!!!!!!!!!!!!!

    दरअसल वह ऐसा समय था
    कि एक कविता मेरी मुट्ठी में धधकती थी
    मैं भागता था
    घर की देहरी से गांव के चौपाल तक
    सौंपने के लिए
    उसे एक मासूम-सी हथेली में
    !!!!!!!!!!!!!!!!
    अद्भुत !!!!

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  10. बहुत सुन्दर कविताए

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  11. बहुत सुन्दर कविताए

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  12. माइंड ब्लोइंग...दिल खुश हो गया...

    शेषनाथ...

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  13. बिमलेश भैया ....
    एक सहज अनुभूति आपको पढ़ते हुए ....
    सुखद और सुन्दर
    नवीनता लिए ....
    सभ्यता का सबसे पवित्र
    और सबसे खतरनाक कर्म...

    धन्यवाद

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  14. प्रफुल्ल कोलख्यान20 सितंबर 2011 को 10:31 pm

    अच्छी कविता है। विमलेश जी।

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