प्रांजल धर:
















कुछ भी कहना ख़तरे से खाली नहीं:

इतना तो कहा ही जा सकता है कि कुछ भी कहना
ख़तरे से खाली नहीं रहा अब
इसलिए उतना ही देखो, जितना दिखाई दे पहली बार में,
हर दूसरी कोशिश आत्महत्या का सुनहरा आमन्त्रण है
और आत्महत्या कितना बड़ा पाप है, यह सबको नहीं पता,
कुछ बुनकर या विदर्भवासी इसका कुछ-कुछ अर्थ
टूटे-फूटे शब्दों में ज़रूर बता सकते हैं शायद।

मतदान के अधिकार और राजनीतिक लोकतन्त्र के सँकरे
तंग गलियारों से गुज़रकर स्वतन्त्रता की देवी
आज माफ़ियाओं के सिरहाने बैठ गयी है स्थिरचित्त,
न्याय की देवी तो बहुत पहले से विवश है
आँखों पर गहरे एक रंग की पट्टी को बाँधकर बुरी तरह...

बहरहाल दुनिया के बड़े काम आज अनुमानों पर चलते हैं,
- क्रिकेट की मैच-फ़िक्सिंग हो या शेयर बाज़ार के सटोरिये
अनुमान निश्चयात्मकता के ठोस दर्शन से हीन होता है
इसीलिए आपने जो सुना, सम्भव है वह बोला ही न गया हो
और आप जो बोलते हैं, उसके सुने जाने की उम्मीद बहुत कम है...

सुरक्षित संवाद वही हैं जो द्वि-अर्थी हों ताकि
बाद में आपसे कहा जा सके कि मेरा तो मतलब यह था ही नहीं
भ्रान्ति और भ्रम के बीच सन्देह की सँकरी लकीरें रेंगती हैं
इसीलिए
सिर्फ़ इतना ही कहा जा सकता है कि कुछ भी कहना
ख़तरे से खाली नहीं रहा अब !





चली गयी वह, कहती थी जो:
(अपने प्यारे कवि भगवत रावत जी के लिए)

चली गयी वह कहती थी जो
लाख तपस्या का कठोर व्रत हो
अपने प्रेमी का जूठा पानी पीने से
जो टूट नहीं सकता।
काग़ज़ की पुड़िया में सिमटी
मिश्री की कुछ डलियाँ, लौंग और
ख़ास चीनी की ही कुछ मिठाइयाँ व्रत का
प्रसाद हुआ करती थीं,
प्रेम का प्रासाद हुआ करती थीं।
प्रसाद में झाँकता जीवन प्रासाद के जीवन से भिन्न था
औपचारिकताओं का व्याकरण नहीं था यहाँ बिल्कुल
और न ही खिंचा था कोई परदा स्व व पर के बीच,
न ही बोलने के पहले सोचना पड़ता देर तक।

दिल्ली जैसा शहर प्रासादों से भरा है
खाली है मानसिक भूगोल लोगों का प्रसाद से
हवाओं में दुआओं की नमी ग़ायब है दूर तक
सच कहा कि दिल्ली की है आबो हवा और !
लाख ग़लतियाँ करो, यहाँ माखने वाला नहीं कोई
चली गयी वह, कहती थी जो –
माखता वही है जो प्यार करता हो आपसे
नीक लगती हों जिसकी सभी जघन्यताएँ...

दिल्ली में तो बहुत मामूली शब्दों के अर्थों पर
होते हैं कई सेमिनार, होते कई भाषण
खिंच जातीं तलवारें ज़रा-ज़रा-सी बात पर
नकली फूलों से भरे पड़े हैं गलियारे सभी यहाँ
शहरी चकर-मकर में खो गए हैं सूत्र पारिवारिक बन्धन के
माँयें अक्सर बेख़बर हैं, बच्चे अक्सर बेफ़िक्र
सच कहा कि दिल्ली की है आबो हवा और !
चली गयी वह, कहती थी जो –
छोटे-छोटे कस्बों में ही बड़े-बड़े प्रेमी रहते हैं।

छोटे-छोटे कस्बों में मिलकर रहते सभी
अमीर-ग़रीब, हिन्दू-मुसलमान...
बारात विदा करने के लिए जुट जातीं कस्बे की सारी औरतें,
खुश हो जाते छोटे-छोटे बच्चे भी, मानो उन्हीं की शादी हो
परदेस से लौटा कोई कमाऊ पूत जाता सभी के घर
बारी-बारी, हाल-चाल लेने,
पर दिल्ली में तो हरेक होटल सजा है व्रत की
शाकाहारी हरी-भरी थालियों से
कई बार व्रत यहाँ वरदान है जिसमें किसी की
सलामती की कोई कामना नहीं, दूर तक।
दिल्ली में निर्जला व्रत की बात करना मूर्खता है,
सच कहा कि दिल्ली की है आबो हवा और !
चली गयी वह, कहती थी जो –
पाएँगे आप मुझे हर ऐसी जगह जहाँ विश्राम मिले
मन को देर तक,
चली गयी वह...।



प्यार और इंक रिमूवर:

प्रेम पाती में उमड़ रहे शब्दों से
झाँकता है इंक रिमूवर आजकल।

जब प्रेम एक योजना हो
तो एक बार लिखने से पहले
सौ बार सोचना भी बहुत कम पड़ जाता है,
पाती में लिखा शब्द योजना की परतों में
बुरी तरह गड़ जाता है,
और योजना को अंजाम तक पहुँचाने की
गाढ़ी लालसा में हर बार शब्दों पर
इंक रिमूवर चढ़ जाता है।
फिर लिखे जाते नये शब्द,
उन पर फिर चढ़ता इंक रिमूवर।
फिर लिखा जाता कोई नया लफ़्ज
लेकिन फिर इंक रिमूवर...!

प्यार और इंक रिमूवर पर्यायवाची हैं क्या !
या दोनों साथ-साथ मिले थे
हड़प्पा की खुदाई में !



पल भर में:

ज़िन्दगी के लम्बे प्लेटफ़ॉर्म पर
न जाने क्या सोचते-सोचते
ग़लत टिकट ख़रीद डाला
मौत के एक हिम्मती लेकिन उदास यात्री ने।
साँसों की टिकट-खिड़की से
आशंकित सफर के
अनेक ख़तरे नज़र आ जाते हैं,
ऐसे बहुत सारे यात्री
सफर के बन्दोबस्त को
टूटा और बिखरा हुआ पाते हैं !
और लाल-हरे सिग्नलों के कितने ही नियम
पल भर में टूट जाते हैं।
कुछ को लूटता है सफर और कुछ
सफर को ही लूट जाते हैं।


सम्पर्क- प्रांजल धर
2710, भूतल
डॉ. मुखर्जी नगर, दिल्ली – 110009

मोबाइल – 09990665881, ईमेल – pranjaldhar@gmail.com

5 टिप्‍पणियां:

  1. अच्छी कवितायें हैं अपर्णा जी ! प्रांजल को हार्दिक बधाई...!

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  2. बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!

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  3. कमाल,सुन्दर व् सार्थक प्रस्तुति.
    कभी यहाँ भी पधारें और लेखन भाने पर अनुसरण अथवा टिपण्णी के रूप में स्नेह प्रकट करने की कृपा करें |
    http://madan-saxena.blogspot.in/
    http://mmsaxena.blogspot.in/
    http://madanmohansaxena.blogspot.in/

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  4. धनंजय कुमार27 अगस्त 2013 को 12:59 am

    प्रांजल भाई की कविताओं का कैनवस अत्यंत व्यापक है । एक ओर जहाँ वे सामाजिक ,राजनीतिक और सांस्कृतिक स्थिति से अपना सहज सरोकार व्यक्त करते हैं तो दूसरी ओर नितांत व्यक्तिगत सम्बंधों में हो रहे सूक्ष्म परिवर्तनों की आहट को भी महसूस करते हैं और उसकी बखूबी व्यंजित भी करते हैं ।

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